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बढ़ती महंगाई और राजनीतिक असंतोष बना ईरानी शासन के लिए खतरा

ओमिद बरीन
२ जनवरी २०२६

तेजी से बढ़ती महंगाई और ईरानी रियाल मुद्रा की घटते मूल्य के कारण भड़के विरोध प्रदर्शनों ने व्यापक राजनीतिक असंतोष को उजागर किया है. विश्लेषकों का कहना है कि गहरे आर्थिक संकट ने शासन की सत्ता के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.

प्रदर्शनकारियों का यह भी कहना है कि सरकार देश के भीतर कल्याण पर ध्यान देने के बजाय विदेशों में अपने सहयोगी गुटों जैसे हमास और हिज्बुल्लाह को समर्थन देने को प्राथमिकता दे रही है
प्रदर्शनकारियों का यह भी कहना है कि सरकार देश के भीतर कल्याण पर ध्यान देने के बजाय विदेशों में अपने सहयोगी गुटों जैसे हमास और हिज्बुल्लाह को समर्थन देने को प्राथमिकता दे रही हैतस्वीर: Farsnews

ईरान इन दिनों गहरे आर्थिक संकट में फंसा हुआ है, जहां रियाल की कीमत में अभूतपूर्व गिरावट और तेज महंगाई देखी जा रही है. इसी बीच पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों की एक लहर फैल गई है. 28 दिसंबर को तेहरान में व्यापारियों की हड़ताल से शुरू हुए ये प्रदर्शन, छात्रों के आंदोलन में शामिल होने के बाद और भी तेज हो गए. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये प्रदर्शन केवल आर्थिक परेशानियों तक सीमित नहीं हैं.

जानकार मानते हैं कि 2022 के "विमेन लाइफ फ्रीडम" आंदोलन के बाद इस्लामी शासन के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है और यह सरकार के खिलाफ बढ़ते राजनीतिक असंतोष और गुस्से को दर्शाता है.

सरकार से जनता का भरोसा घटा

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में ईरानी पुलिस को प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और प्लास्टिक की गोलियां चलाते हुए देखा जा सकता है. प्रदर्शनकारी देश के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और इस्लामी गणराज्य की विदेश नीति के खिलाफ नारे लगा रहे हैं. ऑनलाइन फुटेज में लोग "तानाशाह को मौत" और "ना गाजा, ना लेबनान, मेरी जान ईरान के लिए" जैसे नारे लगाते दिख रहे हैं.

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अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल फ्लोरिडा में राजनीति विज्ञान के शोध छात्र कासरा कारेदागी का कहना है कि ईरान में विरोध प्रदर्शन अक्सर आर्थिक मुद्दों से शुरू होकर व्यापक राजनीतिक मांगों में बदल जाते हैं. कारेदागी ने डीडब्ल्यू से कहा, "जब जीवनयापन की लागत बढ़ती है लेकिन आय और नौकरी की सुरक्षा उसी गति से नहीं बढ़ती, तो आजीविका से जुड़ी शिकायतें जल्दी ही असंतोष में बदल जाती हैं." उन्होंने कहा कि यह आर्थिक संकट ऐसे समय में सामने आ रहा है, जब महंगाई को नियंत्रित करने और स्थिरता लाने की सरकार की क्षमता पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ चुका है.

सरकार पर व्यापक भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. प्रदर्शनकारियों का यह भी कहना है कि सरकार देश के भीतर कल्याण पर ध्यान देने के बजाय, विदेशों में अपने सहयोगी गुटों जैसे हमास और हिज्बुल्लाह को समर्थन देने को प्राथमिकता दे रही है और आजादी को दबा रही है.

अभी क्यों भड़के प्रदर्शन

आर्थिक संकट के चलते ईरान की मुद्रा रियाल गिरकर एक डॉलर के मुकाबले 14 लाख रियाल के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई है. इसी दौरान महंगाई 42 प्रतिशत से ऊपर चली गई है, जिससे जरूरी वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं. खाने-पीने की बुनियादी जरूरत पर ही एक महीने की पूरी तनख्वाह खर्च हो जा रही है.

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पेरिस में रह रहे ईरानी कुर्द पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता अदनान हसनपुर का कहना है कि कड़ी आर्थिक परिस्थितियां और लोगों की आजीविका पर बढ़ता दबाव इन प्रदर्शनों की मुख्य वजह है. हसनपुर के अनुसार मुद्रास्फीति और आर्थिक ठहराव ने लोगों का जीना बेहद मुश्किल बना दिया है और इसी ने मौजूदा अशांति को जन्म दिया है.

कारेदागी भी इससे सहमत हैं. उनका कहना है कि गिरती मुद्रा और लंबे समय से चली आ रही महंगाई के इस खतरनाक मेल ने लोगों और कारोबारियों के लिए बुनियादी आर्थिक फैसले लेना भी कठिन कर दिया है. हसनपुर का कहना है कि शासन के प्रति असंतोष सभी वर्गों में फैला हुआ है और एक सर्वे के अनुसार देश के 92 प्रतिशत लोग असंतुष्ट हैं.

कैसी है ईरानी सरकार की प्रतिक्रिया

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने केंद्रीय बैंक प्रमुख को बदल दिया है और प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से संवाद का वादा किया है. राष्ट्रपति के कार्यकारी उप-प्रमुख मोहम्मद जाफर गाएमपनाह ने महंगाई के लिए पश्चिमी प्रतिबंधों और ईरान के खिलाफ चल रहे आर्थिक युद्ध को जिम्मेदार ठहराते हुए माफी भी मांगी है.

राज्य समर्थित मीडिया के जरिए सरकार ने जनता की नाराजगी को स्वीकार किया है, लेकिन इसे गैर-राजनीतिक बताते हुए केवल आजीविका से जुड़ा मुद्दा कहा गया है. कारेदागी का कहना है कि यह सरकार की ओर से केवल अल्पकालिक संकेत है और यह पर्याप्त नहीं है. हसनपुर का कहना है कि अल्पकालिक आर्थिक सुधार शायद कुछ समय के लिए प्रदर्शनों को शांत कर दें, लेकिन जब तक लोगों के जीवन में ठोस बदलाव नहीं आते, असंतोष खत्म नहीं होगा.

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सरकार ने संकट से निपटने का वादा किया है, लेकिन देश के महाभियोजक ने चेतावनी दी है कि अगर प्रदर्शन दंगों में बदले तो सख्त कार्रवाई की जाएगी. 2022 में हुए "वीमेन, लाइफ, फ्रीडम" प्रदर्शनों को भी कड़ी कार्रवाई से दबा दिया गया था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों को जेल में डाला गया था.

क्या इस्लामी गणराज्य पतन की ओर है?

निर्वासन में रह रहे विपक्षी नेताओं का कहना है कि मौजूदा अशांति शासन के अंत की शुरुआत हो सकती है. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शिरीन एबादी ने इंस्टाग्राम पर कहा कि इस्लामी गणराज्य अपने अंतिम दिनों में है और लोगों से अत्याचार के खिलाफ एकजुट होने की अपील की.

ईरान के अंतिम शाह के बेटे रजा पहलवी ने भी लोगों से सड़कों पर उतरने का आह्वान किया है और सुरक्षा बलों से जनता के पक्ष में खड़े होने को कहा है.

इविन जेल में बंद राजनीतिक कार्यकर्ता मोस्तफा ताजजादेह ने चेतावनी दी है कि संकट से निकलने का कोई स्पष्ट रास्ता न होने पर ईरान तेजी से अराजकता की ओर बढ़ सकता है.

कारेदागी का कहना है कि अगर आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो यह आंदोलन आजीविका से जुड़ी मांगों से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक रूप ले सकता है. हसनपुर का भी मानना है कि जब तक गहरे राजनीतिक बदलाव नहीं होते और पश्चिम के साथ प्रतिबंध हटाने को लेकर समझौता नहीं होता, तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रहेंगे.

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