ईरान और इस्राएल-अमेरिका युद्ध पर कहां खड़े हैं ब्रिक्स देश
२० मार्च २०२६
तेहरान ने 11 उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले ब्रिक्स समूह से अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है. फिलहाल, भारत इस समूह की अध्यक्षता कर रहा है. ईरान 2024 में इस समूह में शामिल हुआ था.
ईरान एक मजबूत और एकजुट रुख अपनाने की मांग कर रहा है, ताकि वह जिसे ‘सैन्य आक्रामकता' कहता है, उसकी निंदा की जा सके. वह चाहता है कि ब्रिक्स समूह क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाए.
भारत ने अब तक इस संघर्ष में किसी का भी पक्ष लेने से परहेज किया है. उसने संयम बरतने, तनाव कम करने और बातचीत के रास्ते पर लौटने का आग्रह किया है. विश्लेषकों का कहना है कि वाशिंगटन (अमेरिका) इसे ईरान के साथ एकजुटता के बजाय एक रणनीतिक कदम के रूप में देख रहा है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "ब्रिक्स के कुछ सदस्य सीधे तौर पर पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात में शामिल हैं. इसकी वजह से चल रहे संघर्ष पर ब्रिक्स का एक साझा और एकमत रुख बनाने में दिक्कत आ रही है.” उन्होंने कहा, "ब्रिक्स के अध्यक्ष के तौर पर, भारत शेरपा चैनल के माध्यम से सदस्य देशों के बीच बातचीत को बढ़ावा दे रहा है.” उन्होंने इस चैनल का जिक्र करते हुए बताया कि यह सदस्य देशों के बीच बातचीत और तालमेल का मुख्य जरिया है.
ब्रिक्स क्या कर सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की उम्मीदों के बावजूद, ब्रिक्स की प्रतिक्रिया देने की क्षमता सीमित है. ब्रिक्स के सदस्य देशों की संख्या बढ़ने से इनके अंदरूनी मतभेद और गहरे हो गए हैं. यूएई और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश ईरान की भूमिका को लेकर बेहद सतर्क और आशंकित हैं. वहीं, समूह के अन्य देश ऐसा कोई भी रुख अपनाने से बच रहे हैं जिससे यह लगे कि वे अमेरिका के खिलाफ खड़े हैं.
स्वतंत्र शोध मंच ‘मांत्रया' की प्रमुख शांथी मैरिएट डीसूजा ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह गठबंधन बातचीत के एक मंच के तौर पर संभावनाएं रखता है, लेकिन ब्रिक्स से कोई संयुक्त बयान जारी करने की उम्मीद करना शायद अवास्तविक है. किसी भी तरह से हस्तक्षेप करने की तो बात ही छोड़ दें.”
उन्होंने कहा, "ऐसा तब हो सकता है जब युद्ध के हालात सदस्य देशों के अपने हितों के लिए असहनीय हो जाएंगे.” उन्होंने आगे कहा कि यूएई और सऊदी अरब के साथ ईरान की ‘पुरानी और बुनियादी समस्याएं' रही हैं. डीसूजा ने आगे कहा, "चूंकि ईरान खुद इस संघर्ष का एक पक्ष है. इसलिए, किसी एक राय या आम सहमति पर पहुंचना मुश्किल है, भले ही ईरान की अधिकांश कार्रवाइयां अमेरिका-इस्राएल की आक्रामकता के जवाब में रही हों.”
बढ़ रही भारत की दुविधा
डीसूजा ने कहा कि ब्रिक्स के अध्यक्ष के तौर पर, आम सहमति बनाने में भारत की अहम भूमिका है. इससे उसे इस समूह की ओर से बयान जारी करने का अधिकार मिल जाता है. वह बताती हैं, "लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में, इस तरह के किसी भी कदम का उस चीज पर बहुत कम असर होगा जो अमेरिका और इस्राएल, ईरान में हासिल करना चाहते हैं." उन्होंने आगे कहा कि ब्रिक्स एक ‘सैद्धांतिक रुख' भी जाहिर करने में असमर्थ है.
डॉनल्ड ट्रंप कर रहे हैं ब्रिक्स को मजबूत?
अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत रही मीरा शंकर ने डीडब्ल्यू को बताया कि मौजूदा स्थिति में आम सहमति वाले किसी बयान की संभावना कम ही लगती है. उन्होंने कहा, "ब्रिक्स एक जैसी सोच वाले देशों का गठबंधन नहीं है. यह एक ढीला-ढाला समूह है जिसका एजेंडा काफी व्यापक है. इसमें व्यापार, विकास, आर्थिक सहयोग और बहुपक्षवाद को मजबूत करना शामिल है.”
शंकर ने कहा कि ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर इस गुट के सदस्य देश ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, इथियोपिया, इंडोनेशिया और ईरान मिलकर काम करना फायदेमंद मानते हैं, भले ही वे दूसरे मुद्दों पर सहमत न हों.
भारत का संतुलन बनाने का प्रयास
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की. वहां के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने भारतीय समकक्ष एस. जयशंकर के साथ कई बार फोन पर बात की. इन बातचीत का मकसद स्थिरता के लिए ब्रिक्स को सक्रिय करना और अमेरिका-इस्राएल के हमलों की निंदा करना था.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर यूरोपियन स्टडीज के प्रोफेसर गुलशन सचदेवा ने डीडब्ल्यू को बताया, "ब्रिक्स की अध्यक्षता होने के बावजूद, नई दिल्ली ने ईरान पर अमेरिका-इस्राएल युद्ध के मामले में काफी हद तक चुप्पी साधे रखी है. यहां तक कि ब्रिक्स के एक सदस्य देश के राष्ट्राध्यक्ष की हत्या के बाद भी, जो कि साफ तौर पर अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन था.”
उन्होंने कहा, "स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावी रूप से बंद होने के साथ-साथ यह फैलता हुआ युद्ध नई दिल्ली को अपनी स्थिति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर भारत का ऊर्जा आयात काफी ज्यादा निर्भर है.” उन्होंने इस रणनीतिक जलमार्ग में शिपिंग (जहाजों की आवाजाही) में आ रही बाधा के संदर्भ में यह बात कही.
भारत, ब्राजील और चीन पर रूस के साथ कारोबार बंद करने का भारी दबाव
सचदेवा ने इशारा किया कि तेहरान ने भारतीय झंडे वाले जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की इजाजत देना शुरू कर दिया है, लेकिन यह हर मामले में अलग-अलग आधार पर किया जा रहा है. हालांकि, उसे बदले में कुछ राजनीतिक संकेत मिलने की उम्मीद हो सकती है. सचदेवा ने कहा, "ईरान को ब्रिक्स से एक मजबूत बयान की उम्मीद हो सकती है, लेकिन भारत को सऊदी अरब और यूएई जैसे दूसरे क्षेत्रीय सदस्यों की स्थितियों को लेकर भी संतुलन बनाए रखना होगा.”
इन दोनों देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं और संघर्ष के दौरान इन पर ईरान ने हमले भी किए हैं. उन्होंने कहा, "काफी हद तक, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या वह अपने एक सदस्य (ईरान) पर हुए हमले के खिलाफ समूह को सक्रिय रूप से लामबंद करता है और तनाव कम करने के लिए जोर देता है या फिर वह ऐसे सामान्य औपचारिक बैठकों तक ही सीमित रहता है जिनका कोई खास नतीजा नहीं निकलता.”
आपसी हितों के टकराव से बंटा एक गुट
इस संकट ने ब्रिक्स के भीतर की गहरी दरारों को उजागर कर दिया है, जिसमें सदस्य देश अलग-अलग खेमों में बंटे हुए हैं. भारत ने विशेष रूप से अमेरिका-इस्राएल के हमलों की आलोचना करने से परहेज किया है.
पूर्व भारतीय राजनयिक अजय बिसारिया ने डीडब्ल्यू को बताया कि मध्य-पूर्व के संकट ने ‘विस्तारित ब्रिक्स के भीतर के राजनीतिक विरोधाभासों' को उजागर कर दिया है. उन्होंने कहा, "ब्रिक्स के सदस्य देश एक सक्रिय सैन्य संघर्ष में एक-दूसरे के आमने-सामने हैं, जिसमें ईरान, सऊदी अरब और यूएई के बुनियादी ढांचों पर हमले कर रहा है. अध्यक्ष के तौर पर भारत ब्रिक्स को एक ‘गैर-पश्चिमी' आर्थिक समूह के रूप में देखता है, न कि एक ‘पश्चिम-विरोधी' सुरक्षा गठबंधन के रूप में.”
वह आगे कहते हैं, "ब्रिक्स की ओर से एक साझा बयान जारी न कर पाना इस गुट की भू-राजनीतिक सीमाओं को दिखाता है. इससे यह भी पता चलता है कि यह समूह ज्यादातर आर्थिक मुद्दों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर ही ध्यान देता है.”
बिसारिया ने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स के अध्यक्ष के तौर पर भारत संभावित रूप से एक अधिक सक्रिय और प्रभावशाली रुख अपना सकता है. उन्होंने कहा, "भारत एक अध्यक्षीय बयान जारी कर सकता है, जिसमें इस हमले और ब्रिक्स के एक सदस्य देश के साथ चल रहे युद्ध पर गहरी चिंता व्यक्त की जा सकती है. यह समूह ‘बातचीत और कूटनीति' का रास्ता साफ करने के लिए युद्ध को तत्काल रोकने की अपील कर सकता है.”
बिसारिया ने कहा कि इससे भी अहम बात यह है कि यह संकट भारत को एक ऐसा मौका भी देता है कि वह शायद ब्रिक्स के दूसरे तटस्थ सदस्यों के साथ मिलकर शांति-दूत की भूमिका निभा सके. डीसूजा का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब ब्रिक्स ने इस तरह की चुनौती का सामना किया है. यूक्रेन युद्ध ने पहले ही इस संगठन की आम सहमति बनाने की सीमित क्षमता को उजागर कर दिया है. उन्होंने कहा, "आज की दुनिया में, बहुपक्षीय मंचों और क्षेत्रीय संगठनों का देशों की कार्रवाइयों पर नियंत्रण या असर कम होता दिख रहा है.”