यूएनजीए की बैठक में क्यों नहीं शामिल हो रहे ये बड़े नेता
२५ सितम्बर २०२६
संयुक्त राष्ट्र महासभा जैसा बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच शायद ही कोई वैश्विक नेता छोड़ना चाहे. डॉनल्ड ट्रंप, रेचेप तैयप एर्दोआन और इमानुएल माक्रों समेत कई नेता यूएन महासभा के 81वें सत्र यानी यूएनजीए81 के लिए न्यूयॉर्क में हैं. यहां हरे संगमरमर के पोडियम से दिए गए भाषणों पर पूरी दुनिया की नजर रहती है और वे अक्सर सुर्खियां बनते हैं.
इसी वजह से कुछ नेताओं का इस बैठक में शामिल नहीं होना और भी हैरान करने वाला है. आइए जानते हैं कि कौन-कौन से नेता इसमें शामिल नहीं हो पा रहे हैं और इसकी क्या वजह है.
जर्मनी: फ्रीडरिष मैर्त्स
बतौर जर्मन चांसलर, यह फ्रीडरिष मैर्त्स का दूसरा साल है. वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर ज्यादा सक्रिय रहना चाहते हैं. उन्होंने खुद को "विदेश नीति पर ध्यान देने वाला चांसलर” बताया है, लेकिन घरेलू राजनीति में व्यस्तता के कारण वे इस बार के यूएन महासभा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं.
सितंबर में जर्मनी के तीन राज्यों में चुनाव हुए. इसके बाद, चांसलर और क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीयू) के नेता फ्रीडरिष मैर्त्स पर पहले से कहीं ज्यादा दबाव है. सैक्सनी-अनहाल्ट और बर्लिन में सीडीयू पार्टी सत्ता से बाहर हो गई, जबकि मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया में पार्टी राज्य की संसद में भी जगह नहीं बना पाई. संघीय गणराज्य जर्मनी की स्थापना के बाद ऐसा पहली बार हुआ है.
मैर्त्स इस समय संकट से निपटने में व्यस्त हैं. ऐसा लगता है कि वे नहीं चाहते कि उनकी गैर-मौजूदगी में उनके विरोधी बगावत की कोई योजना बनाएं. उनकी जगह जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल यूएन महासभा में भाषण देंगे.
इटली: जॉर्जिया मेलोनी
इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी की स्थिति मैर्त्स की तुलना में काफी मजबूत है, लेकिन उन्होंने कहा है कि इस हफ्ते उन्हें देश के अंदरूनी मामलों पर ध्यान देना है. जुलाई की शुरुआत में नाटो शिखर सम्मेलन के बाद जॉर्जिया मेलोनी ने कहा था कि वह कई अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलनों से लौटकर आई हैं और अब इटली से जुड़े कई लंबित मुद्दों पर काम करना है.
उन्होंने यह भी कहा कि मैर्त्स 2025 में भी यूएन महासभा में शामिल नहीं हुए थे. मेलोनी भी अपनी जगह विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी को भेज रही हैं.
दक्षिण अफ्रीका: सिरिल रामाफोसा
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति भी हाल ही में भारत में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल हुए थे. उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य कारणों से वह यूएन महासभा में शामिल नहीं होंगे. डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने और ठीक होने के लिए समय देने की सलाह दी है. रामाफोसा के कार्यालय ने उनकी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की है.
यूएन महासभा में दक्षिण अफ्रीका का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री रोनाल्ड लामोला करेंगे.
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मिस्र: अब्देल फतह अल सिसी
अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ महाद्वीप की दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी अपने राष्ट्रपतियों को न्यूयॉर्क नहीं भेज रही हैं. मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी की जगह प्रधानमंत्री मुस्तफा मदबूली यूएन महासभा में शामिल होंगे. अल-सिसी के कार्यालय ने उनके न आने का कोई कारण नहीं बताया है.
2014 से अपने कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में राष्ट्रपति नियमित रूप से यूएन महासभा में शामिल होते रहे हैं. 2020 में कोरोना महामारी के कारण महासभा ऑनलाइन आयोजित की गई थी. अगले साल यह हाइब्रिड तरीके से हुई, जिसमें अल-सिसी ने पहले से रिकॉर्ड किया वीडियो संदेश भेजा था. इसके बाद, जब महासभा में आमने-सामने की बैठकें फिर से शुरू हुई हैं, तब से वे इसमें शामिल नहीं हुए हैं.
नाइजीरिया: बोला टिनुबू
नाइजीरिया के राष्ट्रपति बोला टिनुबू इस साल की यूएन जनरल असेंबली में शामिल न होने वाले तीसरे प्रभावशाली अफ्रीकी नेता हैं. नाइजीरियाई मीडिया ने उनके प्रवक्ता के हवाले से बताया कि इस पश्चिम अफ्रीकी देश का "पूरी तरह और प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व” उपराष्ट्रपति काशिम शेटिमा करेंगे. वहीं, टिनुबू इस समय छुट्टियों पर हैं. फ्रांस जाने से पहले उन्होंने अगस्त के आखिर में यूके में समय बिताया था.
भारत: नरेंद्र मोदी
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूएन जनरल असेंबली में बहुत कम ही शामिल होते हैं. उन्होंने पिछली बार 2021 में वहां भाषण दिया था. तब से, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र लगातार विदेश मंत्री एस. जयशंकर को ही वहां भेजता रहा है.
भारतीय मीडिया के अनुसार, मोदी का नाम इस साल के कार्यक्रम के वक्ताओं की सूची में शामिल था, लेकिन बाद में उनकी योजना बदल गई. उन्होंने इसमें शामिल न होने का फैसला क्यों किया, यह पता नहीं चल पाया है.
चीन: शी जिनपिंग
इस साल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के यूएन महासभा में शामिल नहीं होने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है. इस साल के "हाई-लेवल वीक” के दौरान शी अमेरिका में ही होंगे, लेकिन न्यूयॉर्क नहीं जाएंगे. इसके बजाय, वह करीब 300 किलोमीटर दूर वॉशिंगटन जाएंगे, जहां उनका पूरा राजकीय दौरा होगा. इसमें व्हाइट हाउस में आयोजित विशेष रात्रिभोज और सैन्य परेड भी शामिल है.
हालांकि, बीजिंग ने इसे इस तरह पेश नहीं किया है, लेकिन समय को देखते हुए ऐसा लगता है कि शी जिनपिंग संयुक्त राष्ट्र के बहुपक्षीय मंच के मुकाबले बड़ी शक्तियों के बीच कूटनीति को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं. शी और ट्रंप के बीच कई गंभीर मतभेद हैं, जिनमें व्यापारिक संबंध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ताइवान की सुरक्षा स्थिति जैसे मुद्दे शामिल हैं.
रूस: व्लादिमीर पुतिन
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी इस प्रतिष्ठित पोडियम पर बहुत कम बार खड़े हुए हैं. इसलिए, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि इस साल भी रूस की ओर से विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ही बोलेंगे.
पुतिन ने एक आदेश जारी कर यह फैसला किया और अपनी गैरमौजूदगी की कोई वजह नहीं बताई.
फलस्तीनी इलाके: महमूद अब्बास
ऊपर जिन नेताओं का जिक्र हुआ है उनकी तुलना में, महमूद अब्बास को यूएन महासभा का कहीं ज्यादा अनुभव है. 2005 से पद पर मौजूद फलस्तीनी प्राधिकरण के राष्ट्रपति अब्बास, डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल तक यूएन महासभा में नियमित रूप से शामिल होते रहे थे. लेकिन ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल उन्हें राजनयिक वीजा देने से इनकार कर दिया था और इस साल भी ऐसा ही किया है.
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फिर भी, 1947 के यूएन मुख्यालय समझौते के तहत अमेरिका विदेशी प्रतिनिधियों को यूएन मुख्यालय तक पहुंचने की सुविधा देने के लिए बाध्य है. उदाहरण के लिए, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने इस बार भी न्यूयॉर्क में भाषण दिया है, जबकि अमेरिका ने हाल ही में ईरान पर बमबारी की थी.
फलस्तीनियों के मामले में अमेरिकी विदेश विभाग ने हाल ही में कहा कि वह उन प्रतिबंधों को आगे भी लागू रखेगा, "जिनके तहत फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) और फलस्तीनी प्राधिकरण के सदस्यों को वीजा नहीं दिया जाता है.” अब्बास की योजना है कि वे वहां मौजूद राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों को वीडियो संदेश के जरिए संबोधित करेंगे. पिछले साल भी उन्होंने ऐसा ही किया था.