पीढ़ियों से भारत में जीवन और मानसून की लय साथ चलती आई है. लेकिन अब मानसून का मिजाज बदल रहा है. कहीं लंबा सूखा, तो कहीं बादल फटना और बाढ़ की घटनाएं ना सिर्फ जलवायु परिवर्तन, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को भी बिगाड़ रहे हैं.
भारत के शहरों में पानी की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं हैतस्वीर: Sanchit Khanna/Hindustan Times/Sipa USA/picture alliance
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आमतौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून के महीने में दस्तक देता है और सितंबर आते-आते विदा लेने लगता है. देश की सालाना बारिश काफी हद तक इस मानसून पर ही निर्भर है.
हालांकि, मानसून के आने का समय और बारिश की तीव्रता पहले भी बदलती रही है, लेकिन एक तय पैटर्न रहता था. इसी के हिसाब से किसान, शहर और कारोबारी अपनी तैयारियां करते थे. अब मानसून का यह पुराना पैटर्न बदल रहा है.
जुलाई के अंत से लेकर अब तक भारत के अलग-अलग हिस्सों में भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और बिजली गिरने से 100 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है.
इस साल पूर्वोत्तर राज्य असम इस मानसून की बलि चढ़ा है. यहां बाढ़ से 1.2 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं. दूसरी तरफ, केरल, जम्मू-कश्मीर, बिहार और झारखंड में भी जान माल का भारी नुकसान हुआ है.
निर्माण के चलते कंक्रीट का जंगल फैलता जा रहा है और जमीन तक बारिश का पानी पहुंच नहीं पा रहा हैतस्वीर: Sanchit Khanna/Hindustan Times/Sipa USA/picture alliance
यहां दिक्कत ज्यादा बारिश की नहीं है, बल्कि बारिश के पैटर्न की है, जो अब बिल्कुल बदल चुका है. लंबे समय तक सूखा पड़ने के बाद जब अचानक कुछ ही घंटों में तेज बारिश होती है, तो नदियां उफान पर आ जाती हैं, शहरों के ड्रेनेज सिस्टम जवाब दे देते हैं और पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है.
मौसम में हो रही उठापटक को अल नीनो ने और गंभीर बना दिया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार बदल रहे मौसम की एक बड़ी वजह बदलती जलवायु है.
ये नए दौर का मानसून है?
यूके के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंस एण्ड यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक अक्षय देवरस भारतीय मानसून के बारे में कहते हैं कि वह "पूरी तरह एक अलग दौर” में प्रवेश कर चुका है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "तेज बारिश और थमी हुई बारिश, दोनों ही हमेशा से मानसून का हिस्सा रहे हैं. अब फर्क बस इतना है कि इनकी तीव्रता बढ़ रही है.”
उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे वातावरण गर्म होता है, हवा में नमी जमा होती है. इससे बारिश कई गुना तेज और गंभीर हो जाती है.
कई हफ्तों तक सूखा पड़ने के बाद मिट्टी सख्त हो जाती है और पानी को सोख नहीं पातीतस्वीर: Parveen Kumar/Hindustan Times/Sipa USA/picture alliance
जलवायु वैज्ञानिक और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव, माधवन नायर राजीवन का कहना है कि मानसून के मिजाज में बदलाव साफ नजर आ रहा है. उनका कहना है कि मानसून के पूरे सीजन में होने वाली कुल बारिश अभी भी लगभग पहले जितनी ही है. लेकिन बारिश कब होती है, कितनी तेजी से होती है और किस इलाके में कितनी बारिश होती है, इसमें साफ बदलाव नजर आ रहा है.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "भारतीय मानसून का मिजाज पहले से काफी बदल गया है. अब कम समय में ज्यादा बारिश होने लगी है, लंबा सूखा पड़ने लगा है और मानसून की बारिश कब, कितनी और किस इलाके में होगी, इसमें भी काफी बदलाव देखने को मिल रहा है.”
उनका मानना है कि यह सिर्फ मौसम में होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से नहीं हो रहा है. उन्होंने कहा, "यह मानसून के पूरे सिस्टम में हो रहे एक बड़े बदलाव का संकेत है.”
भारत के जम्मू इलाके में भारी बारिश के बाद आई अचानक बाढ़ ने भारी नुकसान किया है. दर्जनों लोगों की मौत हुई है और कई लोग लापता हैं. इलाके में अभी और बारिश और बाढ़ की आशंका बनी हुई है.
तस्वीर: ANI Photo
भारी नुकसान
जम्मू के वैष्णो देवी तीर्थ स्थल के रास्ते में भूस्खलन की वजह से कम से कम 30 लोगों के मरने की खबर है. यहां कई लोग लापता भी हैं. राहत और बचाव के लिए बड़े पैमाने पर अभियान शुरू किया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस घटना पर दुख जताया है.
तस्वीर: Stringer/REUTERS
बाढ़ में गिरा पुल
अधिकारियों का कहना है कि 27 अगस्त की सुबह तावी नदी पर बने माधोपुर ब्रिज को काफी नुकसान हुआ. टीवी पर दिखाई जा रही तस्वीरों में पुल का एक हिस्सा ढहने और गाड़ियों को गिरते दिखाया जा रहा है. जम्मू को भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले कई हाइवे को भी कई जगहों पर नुकसान हुआ है.
तस्वीर: Mukesh Gupta/REUTERS
फोन और बिजली बंद
इलाके में टेलिफोन और बिजली की सप्लाई लगभग ठप्प हो गई है. तावी, चेनाब, झेलम और बसंतार नदियों से उफन कर बह रहे पानी से निचले इलाकों में बाढ़ आ गई है. जम्मू के डोडा जिले में बाढ़ की चपेट में आ कर तीन लोगों की मौत हुई है. सड़कों के बंद होने से राहत पहुंचाने में भी दिक्कत हो रही है.
तस्वीर: ANI Photo
368 मिलीमीटर बरसात
मौसम विभाग के मुताबिक जम्मू में 26 अगस्त को 368 मिलीमीटर बरसात हुई है. जम्मू, हिमाचल प्रदेश और पंजाब के कई इलाकों में स्कूलों को बंद कर दिया गया है. लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में भारी बरसात और आंधी का अंदेशा बना हुआ है.
तस्वीर: Mukesh Gupta/REUTERS
भारी बारिश ने मचाई तबाही
मानसून की भीषण बरसात के बाद इलाके में जगह जगह पानी भर गया है. सड़कें, पुल के साथ बहुत से घर भी पानी में डूब गए हैं. हजारों लोगों को अपना घर छोड़ कर सुरक्षित ठिकानों की ओर भागना पड़ा है. कई जगह सड़कों पर गिरे पेड़ों ने रास्ता बंद कर दिया है.
तस्वीर: ANI Photo
बाढ़ और भूस्खलन
जून से सितंबर तक का समय इन इलाकों के लिए खासतौर से मुश्किल भरा होता है. हालांकि हाल के वर्षों में यहां कई आपदाओं का समय बन रहा है. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट ने चेतावनी दी है कि हिंदूकुश के इलाके में ग्लेशियर भारी मात्रा में पिघले हैं और मौसमों का मिजाज लगातार बदल रहा है.
तस्वीर: ANI Photo
और बिगड़ सकते हैं हालात
जम्मू कश्मीर इलाके की लगभग सभी प्रमुख नदियों में पानी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है. मौसम विशेषज्ञ अंदेशा जता रहे हैं कि अभी कुछ और दिनों तक खतरे की स्थिति बनी रही सकती है.
तस्वीर: ANI Photo
भारत ने छोड़ा पानी
भारत ने तीv प्रमुख नदियों के बांधों से पानी छोड़ा है. यह पानी पाकिस्तान के निचले इलाकों में जाता है. इसकी वजह से पाकिस्तान के कई इलाकों में बाढ़ की आशंका है, खासतौर से पंजाब के. पाकिस्तान के अधिकारियों को भारत की ओर इसकी जानकारी दे दी गई थी. इसके बाद पाकिस्तान के अधिकारी, सेना और राहत एजेंसियां सतर्क हो गए.
तस्वीर: Nasir Kachroo/NurPhoto/picture alliance
पाकिस्तान में बाढ़
पाकिस्तान पहले से ही बाढ़ की भारी तबाही झेल रहा है. इस साल अब तक बाढ़ की चपेट में आ कर कम से कम 800 लोगों की मौत हो चुकी है. फसलों का भी भारी नुकसान हुआ है और बड़ी संख्या में लोग बेघर हुए हैं.
तस्वीर: Arif Ali/AFP
विकास की कीमत
विशेषज्ञों का कहना है कि इलाके में अनियंत्रित और बगैर अच्छी योजना के अमल में लाई गई विकास योजनाओं की भी कीमत चुकानी पड़ रही है. जलवायु पर असर के साथ ही यहां की भौगोलिक स्थिति में भी काफी बदलाव हुए हैं जिसके लिए यह इलाका शायद तैयार नहीं है.
तस्वीर: Basit Zargar/ZUMA/IMAGO
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गांव और शहर दोनों खतरे में
भारत के किसान आज भी खेती के लिए काफी हद तक मानसून पर निर्भर है. लंबे समय में बारिश ना हो, तो बुवाई में देरी हो सकती है और मिट्टी में नमी कम हो सकती है. दूसरी तरफ, एकदम से आने वाली तेज बारिश फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है.
यह मुसीबत बस गांवों तक ही सीमित नहीं है. निर्माण के चलते कंक्रीट का जंगल फैलता जा रहा है और जमीन तक बारिश का पानी पहुंच नहीं पा रहा है.
एक और बड़ी समस्या यह भी है कि कई हफ्तों तक सूखा पड़ने के बाद मिट्टी सख्त हो जाती है और पानी को सोख नहीं पाती. ऐसे में जब तेज बारिश होती है, तो पानी जमीन के अंदर जाने के बजाय बाढ़ का रूप ले लेता है.
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बारिश की दिक्कतों से निपटने के लिए भारत क्या कर रहा है
देओरस ने डीडब्ल्यू से कहा, "सबसे बड़ा खतरा कम समय में होने वाली बेहद तेज बारिश है.” उनका कहना है कि भारत का बुनियादी ढांचा इस खतरे को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है. उनके मुताबिक, शहरों की जल निकास प्रणाली और बाढ़ से निपटने वाली व्यवस्था आज भी पुराने पैटर्न पर बनी है. जबकि अब असल मुसीबत कुछ ही घंटों में पूरे शहरों को डूबा देने वाली बारिश है.
उन्होंने कहा कि अब सटीक तरीके से मौसम का अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन इसका फायदा तभी होगा, जब प्रशासन समय रहते उस चेतावनी पर कार्रवाई भी करे.
पिछले 20 साल की सिर्फ दस सबसे बड़ी मौसमी आपदाओं में लगभग साढ़े पांच लाख लोगों की जान गई है. ये हैं दस सबसे घातक आपदाएं.
तस्वीर: Mohammed Shajahan/ZUMA Press/picture alliance
2011 का सूखा, सोमालिया
सोमालिया में 2011 के भीषण सूखे से खाने और पानी का संकट हो पैदा हुआ. कुपोषण और बीमारी के चलते 2.5 लाख से अधिक लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर छोटे बच्चे थे.
तस्वीर: AFP
2008 का चक्रवात नरगिस, दक्षिणी म्यांमार
चक्रवात नरगिस ने म्यांमार के इरावदी डेल्टा क्षेत्र में भारी तबाही मचाई. तूफान के कारण गांव तबाह हो गए और 1.38 लाख से अधिक लोगों की जान चली गई, जबकि लाखों लोग बेघर हो गए.
तस्वीर: Munir Uz Zaman/AFP/Getty Images
2010 की ताप लहर, पश्चिमी रूस
रूस में अत्यधिक गर्मी और जंगलों में आग ने 55,000 से अधिक लोगों की जान ले ली. इसके कारण वायु प्रदूषण बढ़ा और खेती प्रभावित हुई, जिससे खाने-पीने का संकट भी पैदा हुआ.
तस्वीर: AP
2022 में यूरोप में ताप लहर
इटली, स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, ग्रीस, रोमानिया, पुर्तगाल और यूके में फैली इस गर्मी की लहर में 53,000 से अधिक मौतें हुईं. अत्यधिक तापमान ने स्वास्थ्य सेवाओं के लिए चुनौती खड़ी की और गर्मी से संबंधित बीमारियां भी बढ़ीं.
तस्वीर: Francesco Fotia/Avalon/Photoshot/picture alliance
2023 में यूरोपीय ताप लहर
2023 में यूरोप में आई एक और भीषण गर्मी की लहर में 37,000 से अधिक लोग मारे गए. इटली, स्पेन, जर्मनी, ग्रीस और फ्रांस जैसे देशों में रिकॉर्ड तोड़ तापमान ने गर्मी के खतरे को और उजागर किया.
तस्वीर: Roses Nicolas/ABACA/IMAGO
2023 का तूफान डेनियल, लीबिया
लीबिया में तूफान डेनियल के कारण भारी बारिश और बाढ़ आई, जिससे बांध टूट गए और शहर जलमग्न हो गए. 12,000 से अधिक लोग मारे गए, जिससे यह हाल के वर्षों में उत्तर अफ्रीका का सबसे घातक तूफान बना.
तस्वीर: Jamal Alkomaty/AP Photo/picture alliance
2013 का टाइफून हैयान, फिलीपींस
टाइफून हैयान (योलांडा) फिलीपींस से टकराया और 7,300 से अधिक लोगों की जान ले ली. इस शक्तिशाली तूफान ने तटीय क्षेत्रों को तहस-नहस कर दिया और लाखों लोग बेघर हो गए.
तस्वीर: DW/C. Johnson
2013 की बाढ़, उत्तराखंड, भारत
उत्तराखंड में मानसूनी बाढ़ और भूस्खलन ने 6,000 से अधिक लोगों की जान ले ली. इस बाढ़ को “हिमालय की सुनामी” कहा गया, जिसने तीर्थस्थलों और कस्बों में भारी तबाही मचाई.
तस्वीर: REUTERS
2007 का चक्रवात सिद्र, बांग्लादेश
बांग्लादेश में चक्रवात सिद्र ने 4,200 से अधिक लोगों की जान ले ली. तटीय क्षेत्र में कई लोग तूफान से बच नहीं पाए और बड़े पैमाने पर जन-धन की हानि हुई.
तस्वीर: Mohammed Shajahan/ZUMA Press/picture alliance
2015 की यूरोपीय गर्मी की लहर, फ्रांस
यूरोप में फैली इस गर्मी की लहर में फ्रांस को सबसे अधिक नुकसान हुआ. 3,275 मौतों के साथ इस घटना ने जलवायु परिवर्तन के जोखिम को उजागर किया. (डीपीए)
तस्वीर: Francois Mori/AP/picture alliance
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उनका कहना है कि "तुरंत, सटीक फैसले” लेना जरूरी है, जैसे भारी बारिश से पहले स्कूलों के समय में बदलाव करना, लोगों की आवाजाही पर रोक लगाना या खतरे वाले इलाकों को बंद कर देना. पर्यावरण कानून विशेषज्ञ और लीगल इनिशिएटिव फॉर फॉरेस्ट एंड एनवायरनमेंट के मैनेजिंग ट्रस्टी ऋत्विक दत्ता का कहना है कि समस्या सिर्फ बिगड़ते मौसम तक ही सीमित नहीं है.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "अब विज्ञान भी साफ कहता है कि जलवायु परिवर्तन से बारिश का पैटर्न अनियमित हो रहा है. मानसून के दौरान कुछ ही दिनों में बहुत ज्यादा बारिश होती है और उसके बाद लंबे समय तक सूखा पड़ जाता है.” उन्होंने आगे कहा कि समस्या इसलिए और बढ़ रही है क्योंकि भारत में निर्माण से जुड़े फैसले लेते समय जलवायु परिवर्तन को ध्यान में नहीं रखा जाता.
पुणे का उदाहरण देते हुए दत्ता समझाते हैं जैसे राज्य सरकार और द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की एक स्टडी के मुताबिक साल 2030 तक पुणे में बारिश करीब 37 फीसदी बढ़ सकती है. इसके बावजूद शहर की विकास योजनाओं में इस अनुमान को ठीक से शामिल नहीं किया गया है. यहां तक कि नदी किनारे बन रहे रिवरफ्रंट में भी इस खतरे को पर्याप्त तवज्जो नहीं दिया गया है.
दत्ता ने कहा, "जलवायु परिवर्तन की वजह से बांध, तटबंध और सड़कें बड़े नुकसान का शिकार हो सकती हैं. फिर भी हम जलवायु परिवर्तन को सिर्फ कांफ्रेंस और वर्कशॉप तक ही सीमित किए हुए हैं.”
दत्ता मानते हैं, "हम पर्यावरण को अपने खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं.” दत्ता का कहना है कि भारत में पर्यावरण परियोजनाओं को मंजूरी देते समय जलवायु परिवर्तन के असर को ध्यान में रखना जरूरी नहीं माना जाता है. जाहिर है कि यह एक बड़ी समस्या है और प्रशासन का रवैया दिखाती है.
चेन्नई की दलदल में बना स्पंज पार्क जो बाढ़ से बचा सकता है
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पिछले मानसून हजारों मारे गए
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में जिन 334 दिनों पर नजर रखी गई, उनमें से 331 दिन यानी करीब 99 फीसदी दिनों में भारत के किसी ना किसी हिस्से में चरम मौसम की घटनाएं देखने को मिलीं.
इसमें 4,000 से भी ज्यादा लोगों की जान गई, जिसमें करीब 3,000 मौतें मानसून के दौरान हुईं. लगभग 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगातार आठ महीनों तक चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गई.
इस संस्था की डायरेक्टर जनरल सुनीता नारायण का कहना है कि अब जलवायु परिवर्तन को देश की विकास रणनीति का अहम हिस्सा बनाना होगा.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की बात नहीं है. भीषण गर्मी, तेज बारिश और विनाशकारी मौसमी घटनाओं के रूप में यह अब हमारे सामने खड़ा है.” उन्होंने आगे कहा, "अब चुनौती जलवायु परिवर्तन को साबित करना नहीं है, बल्कि असली चुनौती अपनी अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को इस तरह बदलना है कि हम इसके असर का सामना कर सकें.”
वह मानती हैं, "अब शहरों, सड़कों, ड्रेनेज सिस्टम को पुराने पैटर्न के हिसाब से नहीं बनाया जा सकता.” देश में होने वाला हर निवेश इस सोच के साथ किया जाना चाहिए कि आने वाले समय में मौसम और बिगड़ सकता है.
उनका मानना है कि भारत को हर बाढ़ को अलग आपदा मानने से बचना होगा. अब ऐसी योजना बनाने की जरूरत है, जो भविष्य की भीषण मौसमी घटनाओं के अनुसार हो.
गंभीर मौसमी घटनाओं से कैसे बचें
भारत मौसम के एक बिल्कुल नए पैटर्न का सामना कर रहा है. पूरे देश में बारिश कम हो सकती है, लेकिन कुछ इलाकों में बाढ़ के हालात बन सकते हैं. दूसरी तरफ कई हफ्तों से बारिश का इंतजार करने वाले किसानों की फसलें कुछ ही घंटों के अंदर तेज बारिश से बर्बाद हो सकती है. तेज बारिश शहरों की पूरी व्यवस्था को भी चरमरा सकती है.
जलवायु वैज्ञानिक और पूर्व सरकारी अधिकारी राजीवन ने कहा, "अब सिर्फ इन बदलावों को दर्ज करने और उन पर चर्चा करने से काम नहीं चलेगा. हमें ऐसी ठोस योजनाएं लागू करनी होंगी, जो बदलते मौसम के असर से निपट सकें.”
अब शहरों में बाढ़ से निपटने की बेहतर व्यवस्था, खेती के तरीकों में बदलाव, पानी को जमा करने की मजबूत प्रणाली और ऐसा बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा, जो अचानक आने वाली बेहद तेज बारिश को थाम सके.
भारत मानसून या अल नीनो को नियंत्रित नहीं कर सकता और ना ही अकेले ग्लोबल वार्मिंग को रोक सकता है. लेकिन यह जरूर तय कर सकता है कि उसका हर निर्माण, हर प्रणाली और हर योजना भविष्य के मौसम को ध्यान में रखकर तैयार की जाए.
मलबे में पटे कस्बे, पिघलती सड़कें, तबाह होते मकान और पुल...चरम मौसमी आपदाएं दुनिया भर में आधारभूत ढांचे की कमर तोड़ रही हैं.
तस्वीर: Mir Imran/AFP
तबाही मचाता भूस्लखन
भारत समेत दुनिया के ज्यादातर हिस्से, अब बरसात के दौरान भूस्लखन के अनगिनत मामले झेल रहे हैं. कुछ ही घंटों में होने वाली मूसलाधार बारिश, भूस्खलन को भड़काकर जान माल को भारी नुकसान पहुंचा रही है.
तस्वीर: picture alliance / Sipa USA
बाढ़ में बहते पुल
भारत, चीन, पाकिस्तान, स्पेन और ब्राजील, इसके ताजा उदाहरण हैं. बाढ़ पुलों के साथ साथ सीवेज सिस्टमों और सड़कों को भी ध्वस्त कर रही है. एक अनुमान के मुताबिक बीते पांच साल में बाढ़ ने दुनिया भर में 325 अरब डॉलर का नुकसान पहुंचाया है.
तस्वीर: CFOTO/picture alliance
पुलों पर गर्मी की मार
भीषण गर्मी पुलों के आकार को फैला सकती है. कुछ मामलों में इसके नतीजे घातक हो सकते हैं. नीदरलैंड्स में बेहद गर्म दिनों में कई पुलों पर पानी का छिड़काव कर उन्हें ठंडा किया जा रहा है. ऐसा किसी मैकेनिकल नाकामी को रोकने के लिए किया जा रहा है.
तस्वीर: Ramon van Flymen/ANP/IMAGO
बेडौल होती पटरियां
ब्रिटेन में रेल सेवाओं का प्रबंधन करने वाली कंपनी नेटवर्क रेल के मुताबिक, भीषण गर्मी, पटरियों को बेडौल कर सकती है और देर सवेर नट बोल्ट ढीले पड़ सकते हैं. इसका एक आसान समाधान पटरियों पर सफेद पेंट करना है ताकि वे ज्यादा धूप को परावर्तित कर सकें.
तस्वीर: Fabrice Coffrini/AFP
पटरियों पर पानी का स्प्रे
पटरियों को दुरुस्त रखने के लिए कहीं ज्यादा स्लीपर लगाए जा रहे हैं तो कहीं पटरी में ज्यादा गैप बनाए जा रहे हैं. दक्षिण कोरिया में रेलवे लाइनों पर पानी का छिड़काव भी किया जा रहा है.
तस्वीर: Yonhap/picture alliance
कोलतार के साथ पिघलती सड़कें
भीषण गर्मी के दौरान यह तस्वीर नई दिल्ली की एक सड़क की है. 30 डिग्री से ज्यादा गर्मी वाली धूप कोलतार को पिघलाकर सड़कों को बहुत जल्दी खराब करती है. पिघला कोलतार बाकी जीवों के लिए भी जानलेवा मुसीबत बन जाता है.
तस्वीर: Harish Tyagi/EPA/dpa/picture alliance
बांधों को बेकार करता सूखा
सूखे की वजह से स्पेन के मेडियानो बांध का जलस्तर लाखों घनमीटर नीचे गिर गया. सूखा अब पेजयल की सप्लाई, बिजली प्रोडक्शन और नदियों में होने वाली शिपिंग को भी आए दिन प्रभावित कर रहा है.