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कितना भरोसेमंद है रूस का चुनाव

२३ सितम्बर २०२६

करीब 54 महीने से चले आ रहे यूक्रेन युद्ध के बीच रूस में पहली बार संसदीय चुनाव हुए हैं. सत्ताधारी यूनाइटेड रशिया पार्टी ने तीन चौथाई सीटें हासिल कर बड़ी जीत दर्ज की है. इस चुनाव पर दुनिया कितना भरोसा करे?

रूस के संसदीय चुनाव में वोट डालती एक महिला
रूस में संसदीय चुनाव हुए हैं अब तक हुई मतगणना में यूनाइटेड रशिया को भारी जीत मिली है तस्वीर: Ramil Sitdikov/REUTERS

रूस में चुनाव अन्य देशों की तरह ही दिखाई देता है. चुनावी पोस्टर, नेताओं की रैलियां, सोशल मीडिया और मीडिया में चुनाव प्रचार, पोलिंग बूथ के बाहर वोटरों की कतारें और बैलट पेपर. यहां चुनाव के लिए बैलट पेपर के साथ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का भी इस्तेमाल होता है. रूस के बहुदलीय लोकतंत्र में कई पार्टियां भी हैं. संसद के निचले सदन ड्यूमा की 450 सीटों पर उम्मीदवारों को चुनने का तरीका भी संविधान ने ही तय किया है. कई देशों की तरह यहां भी सीधे मतदान और पार्टियों को मिले वोट प्रतिशत दोनों तरीके से संसद की सीटें भरी जाती हैं.

हालांकि फिर भी यहां के चुनाव और उसके नतीजों पर संदेह पैदा होता है, मगर क्यों? दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर रशियन स्टडीज के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं, "एक तो संविधान में ही दिक्कत है. संविधान में राष्ट्रपति को बहुत ज्यादा अधिकार दे दिए गए हैं उसके कारण से दूसरा जो राजनीतिक तंत्र और एक मजबूत लोकतंत्र उभर सकता था वैसा तंत्र वहां नहीं है. वहां मीडिया स्वतंत्र नहीं है जैसा दूसरे लोकतांत्रिक देशों में, भारत में होता है. इसके बाद सिविल सोसायटी भी मजबूत नहीं है और जो कुछ था वो भी युद्ध के कारण नहीं रहा क्योंकि उन पर बहुत ज्यादा नियंत्रण है."

रुस में संसदीय चुनाव हुए हैं तस्वीर: Tatiana Meel/REUTERS

प्रोफेसर कुमार ने तो रूस के लोकतंत्र पर भी सवाल उठाया. डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "संस्थाएं इतनी कमजोर हैं कि वहां पर सफल लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है वास्तव में वहां लोकतंत्र नहीं है. काफी नियंत्रित सिस्टम है, ब्यूरोक्रैसी बहुत ज्यादा है. अलग अलग तरह की जो स्वतंत्रता लोकतंत्र में होती है वह वहां नहीं है."

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पहले चुनाव

तकरीबन 54 महीनों से चल रहे यूक्रेन युद्ध के दौर में पहली बार रूस के संसदीय चुनाव हुए हैं. 18, 19 और 20 सितंबर को यहां मतदान हुआ. आखिरी नतीजों की घोषणा तो शुक्रवार को होगी लेकिन 95 फीसदी से ज्यादा वोटों की गिनती हो चुकी है. संसद के निचले सदन ड्यूमा में यूनाइटेड रशिया पार्टी ने तीन चौथाई से ज्यादा सीटें हासिल की हैं. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस पार्टी के सदस्य नहीं हैं. यूनाइटेड रशिया पार्टी के अध्यक्ष दमित्री मेदवेदेव हैं जो रुस के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी रह चुके हैं. पुतिन इस पार्टी के अधिवेशनों और प्रचार अभियानों में शामिल होते रहे हैं. रूस की राजनीति में दबदबा रखने वाली यह पार्टी पुतिन की नीतियों का पूरा समर्थन करती है.

यूनाइटेड रशिया की इस बड़ी जीत ने रूस के चुनावों पर सवालों को मजबूत किया है. प्रोफेसर कुमार का कहना है, "यूनाइटेड रशिया ऐसी पार्टी है जिसका कोई स्वतंत्र रुख नहीं होता है वो हर मुद्दे पर पुतिन का समर्थन करते हैं इसलिए यूनाइटेड रशिया को एक प्रभावी लोकतांत्रिक दल नहीं कहा जा सकता."

रूस में संसदीय चुनाव के जरिए ड्यूमा के लिए 450 सदस्यों को चुना जाता हैतस्वीर: Sefa Karacan/Anadolu Agency/IMAGO

किसे कहें सत्ताधारी और किसे विपक्ष

रूस में फिलहाल 20 राजनीतिक पार्टियां हैं. इनमें से 17 को चुनाव में हिस्सा लेने की अनुमति है. चुनाव में हिस्सा लेने वाली पार्टियों में सत्ताधारी यूनाइटेड रशिया के साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ द रशियन फेडरेशन, एलडीपीआर, न्यू पीपुल और ए जस्ट रशिया जैसी पार्टियां प्रमुख हैं. अहम बात यह है कि ज्यादातर पार्टियां प्रमुख मुद्दों पर सरकार के रुख का समर्थन करती हैं. जो पार्टी ऐसा नहीं करती उनका चुनाव में हिस्सा लेना मुश्किल हो जाता है. यूक्रेन युद्ध के विरोध में आवाज उठाने वाली उदारवादी याबलोको पार्टी के साथ भी यही हुआ.

अपना सोना क्यों बेच रहा है रूस

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पार्टी को बैलेट पेपर से हटा दिया गया. हालांकि पार्टी ने फिर भी अपने उम्मीदवार खड़े किए और कुछ सीटों पर दूसरे नंबर पर रही है. पिछले दो तीन टर्म से संसद में यूनाइटेड रशिया ही मुख्य पार्टी है. उन्हें ही बहुमत मिल रहा है और वे हर मुद्दे पर राष्ट्रपति का समर्थन करते हैं.

संसदीय चुनाव का नतीजा पक्ष विपक्ष का खेल

रूस में ड्यूमा की 450 में से 225 सीटों के लिए सीधे चुनाव होता है, इन्हें सिंगल पार्टी सीट कहा जाता है. बाकी सीटें प्रमुख राजनीतिक दलों को मिले वोट के आधार पर दी जाती है. यूनाइटेड रशिया को सिंगल सीटों में से 208 सीटों पर जीत मिली है. पार्टी को लगभग 58 फीसदी वोट मिले हैं उसके आधार पर सदन में उसकी कुल सीटों की संख्या 350 के लगभग रहने की उम्मीद है. बाकी सीटें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ द रशियन फेडरेशन, एलडीपीआर, न्यू पीपुल और ए जस्ट रशिया जैसी पार्टियों के पास गई हैं. हालांकि आलोचक कहते हैं कि संसद में पार्टियों के नाम भले अलग अलग हो, लेकिन उनकी नीतियों में फर्क कम ही दिखता है.

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूनाइटेड रशिया पार्टी के आधिकारिक सदस्य नहीं हैं लेकिन वे पार्टी के सम्मेलनों में हिस्सा लेते हैं तस्वीर: Grigory Sysoev/SNA/IMAGO

प्रो. राजन कुमार ने कहा, "जो लिबरल डेमोक्रैटिक पार्टी है वो लिबरल बिल्कुल नहीं है, एलडीपी एक कट्टर राष्ट्रवादी पार्टी है. उसके बाद जो कम्युनिस्ट पार्टी है जुगानोव उसके लीडर हैं वहां 1993 से उसके नेता नहीं बदले हैं एक ही आदमी नेतृत्व कर रहा है. कम्युनिस्ट पार्टी को मिलने वाले वोट अच्छे खासे हैं 10-15, 20 प्रतिशत तक उनके वोट आते हैं लेकिन प्रमुख मुद्दों पर कम्युनिस्ट पार्टी जो दूसरी जगहों पर भूमिका निभाती है वो वहां पर नहीं है. वो राष्ट्रपति के साथ ही रहते हैं."

जाहिर है कि संसद और देश में एक मजबूत विपक्षी दल का ना होना चुनावों की वैधता को चुनौती देता है. पहली बार इस चुनाव में यूक्रेन के उन चार इलाकों में भी मतदान हुआ जिन्हें रूस ने अवैध तरीके से अपने साथ मिला लिया है. इनमें दोनेत्स्क और क्राइमिया भी शामिल हैं. यहां रूसी सैनिकों के पहरे में लोगों ने वोट डाला. माना जा रहा है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस चुनाव के जरिए युद्ध के मुद्दे पर जनता के समर्थन की पुष्टि कराना चाहते हैं. जब चुनावों की वैधता पर ही सवाल हो तो पुतिन दुनिया को कितना समझा सकेंगे यह कहना मुश्किल है. हालांकि ज्यादातर रूसी लोग के लिए यह बात शायद मायने नहीं रखती.

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निखिल रंजन निखिल रंजन एक दशक से डॉयचे वेले के लिए काम कर रहे हैं और मुख्य रूप से राजनैतिक विषयों पर लिखते हैं.
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