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भारत की डिजिटल क्रांति से क्या सीख सकता है जर्मनी?

३१ दिसम्बर २०२५

भारत में अब समोसे बेचने वाले भी डिजिटल तरीके से पैसे लेते हैं, लेकिन तकनीक के क्षेत्र में दुनिया को राह दिखाने वाले जर्मनी में सरकारी सेवाएं आज भी फैक्स और कागजों के ढेर में उलझी हुई हैं.

भारत में एक रिक्शा चालक पेमेंट के लिए अपना QR-कोड दिखाता हुआ
भारत में एक रिक्शा चलाने वाला सवारी से किराया सीधे अपने बैंक खाते में पा रहा है तस्वीर: Aamir Ansari/DW

जब आप जर्मनी में घर बदलते हैं, तो आपको अपना नया पता अधिकारियों के पास रजिस्टर करवाना होता है. इसका मतलब है कि अक्सर आपको सिटी हॉल को कॉल करना होता है, अपॉइंटमेंट के लिए हफ्तों इंतजार करना होता है और कागजी फॉर्म के साथ खुद जाकर मिलना होता है. यकीन मानिए, यह 2025 का हाल है! अगर डॉक्टर के क्लिनिक पर आप अपना इंश्योरेंस कार्ड भूल जाते हैं, तो कुछ ऐप्स आपकी मदद तो करते हैं, लेकिन कैसे? डॉक्टर को एक फैक्स भेजकर.

पहले के समय में इतनी कागजी प्रक्रिया पूरी करने का मतलब समझ में आता था, लेकिन जब मौजूदा दौर में पूरी दुनिया डिजिटल हो चुकी है, उस समय भी जर्मनी के सरकारी कामकाज कागजों के ढेर के सहारे ही हो रहे हैं.

जर्मनी की आईटी इंडस्ट्री एसोसिएशन ‘बिटकॉम' से जुड़े फेलिक्स लेस्नर ने डीडब्ल्यू को बताया, "लगभग तीन-चौथाई, यानी 77 फीसदी जर्मन कंपनियां अभी भी फैक्स मशीन का इस्तेमाल करती हैं. 25 फीसदी कंपनियां इसका अक्सर या बहुत ज्यादा इस्तेमाल करती हैं.” इसकी वजह बताते हुए लेस्नर कहते हैं, "ज्यादातर कंपनियां कहती हैं कि सरकारी अधिकारियों के साथ बातचीत करने के लिए यह बहुत जरूरी है. शायद असल समस्या यहीं पर है.”

डिजिटलीकरण में पीछे क्यों रह गया जर्मनी

यूरोपीय संघ (ईयू) समय-समय पर अपने सदस्य देशों की डिजिटल तरक्की की रैंकिंग जारी करता है. इसमें जर्मनी का प्रदर्शन 27 देशों वाले संघ में कहीं बीच में रहता है. लेकिन जब बात 'ई-गवर्नमेंट' यानी डिजिटल सरकारी सेवाओं की आती है, तो यह देश बहुत पीछे नजर आता है.

कंसल्टेंसी कंपनी ‘केपजेमिनाइ' की एक स्टडी के मुताबिक, जर्मनी यूरोपियन यूनियन में 24वें नंबर पर है. जर्मन इंजीनियरों ने प्रोग्रामेबल कंप्यूटर, सिम कार्ड और एमपी3 टेक्नोलॉजी का आविष्कार किया. फिर भी, कार रजिस्टर करवाने या शादी का लाइसेंस लेने के लिए अभी भी लाइन में लगना पड़ता है.

जर्मन वैज्ञानिक कोनराड जुसे ने दुनिया के पहले प्रोग्रामेबल कंप्यूटर की खोज की थी लेकिन आज वही जर्मनी डिजिटलाइजेशन में इतना पीछे दिखता हैतस्वीर: Oliver Berg/dpa/picture alliance

फ्रांक राइनार्त्स, जर्मन शहर डुसेलडॉर्फ में ‘डिजिटल एजेंसी' कंपनी के प्रमुख हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि जर्मनी के पास योजनाओं और लक्ष्यों की कमी नहीं है. असली चुनौती यह है कि हम चीजों को धरातल पर उतारने में पीछे रह जाते हैं.

डुसेलडॉर्फ में करीब 6 लाख 50 हजार लोग रहते हैं. यह शहर 580 प्रशासनिक सेवाओं में से 120 सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध कराता है, जो 20 फीसदी से थोड़ा ज्यादा है. इसके बावजूद, डुसेलडॉर्फ को डिजिटली एडवांस्ड माना जाता है. बिटकॉम की ओर से तैयार किए गए स्मार्ट सिटी इंडेक्स में यह छठे स्थान पर है. इस इंडेक्स के तहत यह पता लगाया जाता है कि किन शहरों में डिजिटल सेवाओं की स्थिति कैसी है. दूसरी ओर, देश की राजधानी बर्लिन को तो टॉप 40 में जगह बनाने के लिए भी काफी जद्दोजहद करनी पड़ी.

जर्मनी के सिस्टम में ऐसी क्या बात है

जर्मनी की संघीय शासन प्रणाली 16 राज्यों में बंटी हुई है. यह प्रणाली अक्सर डिजिटल प्रगति में बाधा बनती है. केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल की कमी के कारण अक्सर स्थानीय निकायों को अपनी समस्याओं का हल खुद ही तलाशना पड़ता है.

राइनार्त्स बताते हैं, "हमें संघीय सरकार के स्तर से बहुत कम सॉफ्टवेयर और सिस्टम उपलब्ध कराए जाते हैं. इसकी वजह से हर शहर को उन कामों के लिए भी अपना अलग रास्ता ढूंढना पड़ता है जो पूरे देश में एक जैसे हैं, जैसे कि गाड़ी का रजिस्ट्रेशन.”

समस्या की एक बड़ी वजह आपसी तालमेल की कमी और वह स्थिति है जिसे शोधकर्ता स्टेफन कोल ने ‘इंस्टीट्यूशनल इन्फ्लेशन' का नाम दिया है.

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बर्लिन स्थित एसएचआई इंस्टीट्यूट में कोल और उनके साथियों ने इस बात की जांच की कि आखिर पिछले 25 सालों में जर्मनी में डिजिटल सरकारी सेवाएं वास्तव में सफल क्यों नहीं हो पाईं. कोल ने डीडब्ल्यू को बताया, "हर कोई कुछ न कुछ तो कर रहा है, लेकिन सब अपने-अपने दायरे में ही सिमटे हुए हैं. अलग-अलग समाधानों के बीच कोई जुड़ाव नहीं है. कभी-कभी तो उनकी तकनीकें भी एक-दूसरे के लायक नहीं होती हैं.”

राइनार्त्स की डिजिटल एजेंसी इसीलिए बनाई गई थी ताकि इन सब समस्याओं से बचा जा सके. डुसेलडॉर्फ के लिए उनका लक्ष्य एक ऐसी वेबसाइट बनाना है जिसके माध्यम से शहर का हर नागरिक सभी सरकारी सेवाओं का फायदा ऑनलाइन पा सके. उन्होंने कहा, "आप बस लॉग-इन करेंगे और आपको अपनी सारी जानकारी एक ही जगह मिल जाएगी. जैसे, अगर आप मकान मालिक हैं तो घर के टैक्स, बच्चों के किंडरगार्टन, और आपकी कार के पार्किंग परमिट से जुड़ी जानकारी.”

डिजिटल वंडरलैंड बन रहा है डेनमार्क

जहां जर्मनी में बहस जारी है, वहीं डेनमार्क में काम हो रहा है. जर्मनी के उत्तरी पड़ोसी इस देश ने बहुत पहले ही राइनार्त्स के विजन को हकीकत में बदल दिया है. कोपेनहेगन में स्थित ‘डिजिटल हब डेनमार्क' से जुड़े याकॉब फ्रायर कहते हैं, "Borger.dk वेबसाइट वन-स्टॉप-शॉप है. यहां सभी नागरिकों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 2,000 से ज्यादा सरकारी सेवाएं मिलती हैं.”

टैक्स से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक, लगभग सब कुछ ऑनलाइन है. डेनमार्क की ‘एजेंसी फॉर डिजिटल गवर्नमेंट' के डिप्टी डायरेक्टर-जनरल एडम लेबेक ने डीडब्ल्यू को बताया कि इसकी सफलता की असली चाबी एक अनिवार्य ‘डिजिटल आईडी' या ‘ई-आईडी' है. लगभग 97 फीसदी वयस्क लोगों के पास ई-आईडी है. 83 फीसदी लोग हफ्ते में कम से कम एक बार इसका इस्तेमाल करते हैं.

डेनमार्क के इस पूरे सिस्टम की डिजिटल नींव एक इकलौता पहचान नंबर है, जिसे ‘सेंट्रल पर्सन रजिस्टर (सीपीआर)' कहा जाता है. खास बात यह है कि देश ने इसकी शुरुआत बहुत पहले, यानी 1968 में ही कर दी थी. लेबेक कहते हैं, "चूंकि हम सभी सिस्टम के लिए एक ही पहचान नंबर (आईडी) का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए डेटा साझा करना बहुत आसान हो जाता है. इसका मतलब है कि हम अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच बिना किसी रुकावट के सेवाएं दे सकते हैं. लेकिन हां, इसके लिए आपको सरकार पर भरोसा करना होगा.”

नियमित सर्वेक्षणों से पता चलता है कि डेनमार्क के ज्यादातर लोग अपनी सरकार पर भरोसा करते हैं, लेकिन जर्मन लोग सरकार की ओर से डेटा इकट्ठा करने के मामले में कहीं ज्यादा शक्की हैं. इसका मुख्य कारण जर्मनी का नाजी काल और पूर्वी जर्मनी के कम्युनिस्ट शासन के दौरान का कड़वा अनुभव है. हिटलर के थर्ड राइष और पूर्वी जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी, दोनों ने लोगों की जासूसी करने और उनकी जिंदगी को नियंत्रित करने के लिए निजी डेटा का इस्तेमाल किया था.

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भारत में कैसे हुई डिजिटल क्रांति

भारत ने यह दिखा दिया है कि डिजिटल सेवाओं को विकसित करने में बहुत कम समय में बड़ी कामयाबी हासिल की जा सकती है. भारत ने मात्र 15 सालों के भीतर अपना इलेक्ट्रॉनिक आईडी सिस्टम ‘आधार' तैयार किया है. सरकारी आंकड़ों की मानें तो भारत की लगभग 99.9 फीसदी आबादी आधार का इस्तेमाल करती है.

यही नहीं, आधार को ‘यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस' (यूपीआई) नाम के एक डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म से भी जोड़ा गया है. स्थिति यह है कि सड़क किनारे रेहड़ी पर नारियल बेचने वाले दुकानदार भी पेमेंट के लिए यूपीआई इस्तेमाल करते हैं. ग्राहक बस एक क्यूआर-कोड स्कैन करते हैं और मोबाइल ऐप के जरिए पैसे ट्रांसफर कर देते हैं.

टीसीएस के तेज पॉल भाटला का मानना है कि भारत की डिजिटल क्रांति का ढांचा ऐसा है जिस तक निजी और सरकारी दोनों सेवाओं की पहुंच हैतस्वीर: Andreas Becker/Nicolas Martin

भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टीसीएस से जुड़े तेज पॉल भाटला ने डीडब्ल्यू को बताया कि आधार और यूपीआई ‘बुनियादी सिस्टम' हैं. इन्हें सरकार के सहयोग और निजी क्षेत्र से मिली फंडिंग की मदद से तैयार किया गया है.

उन्होंने बताया कि शुरुआत से ही आधार और यूपीआई को ‘ओपन-सोर्स' सिस्टम के रूप में प्लान किया गया था, ताकि सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र इनका इस्तेमाल कर सकें. बिल्कुल वैसे ही जैसे हम सड़कों या पुलों जैसे सार्वजनिक ढांचे का इस्तेमाल करते हैं.

भाटला कहते हैं, "जब आप रेल की पटरियां, हाईवे या बंदरगाह बनाते हैं, तो आप उन्हें सबके लिए उपलब्ध कराते हैं. इसी सोच की वजह से निजी क्षेत्र की कंपनियां इन प्रणालियों का इस्तेमाल कर पाईं, ताकि वे नागरिकों और व्यवसायों के लिए और भी बड़ी सेवाएं तैयार कर सकें और इनका पूरा फायदा पा सकें.”

भाटला ने कहा कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भारत के लिए तरक्की की रफ्तार बढ़ाने का एक बड़ा मौका था. इसकी बदौलत आज लगभग 80 फीसदी वयस्क आबादी के पास बैंक खाते हैं. अगर आधार और यूपीआई नहीं होते, तो आज हमारे पास जितने बैंक खाते हैं, वहां तक पहुंचने में हमें 48 साल लग जाते.

वह कहते हैं, "बेहतर डिजिटल बुनियादी ढांचा और डिजिटल सेवाओं का एक पूरा इकोसिस्टम जर्मनी जैसे देशों में भी आर्थिक विकास की रफ्तार को काफी तेजी से बढ़ा सकता है. अगर आप विकास नहीं करेंगे, तो निश्चित रूप से आपको दूसरी अर्थव्यवस्थाओं से खतरा महसूस होगा. तब जिंदगी और भी मुश्किल होती जाएगी.” 

इस विषय पर विस्तार से जानने के लिए आप DW की नई पॉडकास्ट सीरीज सुन सकते हैं: Delayland: Germany and the Missing Magic

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