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जर्मनी में अब भी पुराने समय के हिसाब से सड़कें बन रही हैं?

३१ जुलाई २०२६

गर्मी से जर्मनी के ऑटोबान हाईवे भले ही टूटने लगे हों, लेकिन वहां की सरकार अब भी पुराने मौसम के हिसाब से ही सड़कें बना रही है. इंजीनियरों को अच्छी तरह पता है कि इस समस्या को हल कैसे किया जा सकता है, तो फिर देरी क्यों ?

जून, 2026 में गर्मी के कारण टूटी जर्मनी की सड़क
जर्मनी में जब तापमान चढ़ा तो कई जगहों पर सड़कें टूट या पिघल गईंतस्वीर: Michael Bahlo/dpa/picture alliance

यूरोप में लगातार कई दिनों तक पड़ने वाली भीषण गर्मी और 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाते तापमान की वजह से जर्मनी के मशहूर ऑटोबान यानी हाईवे को भारी नुकसान पहुंच रहा है. कंक्रीट वाले हिस्से टूट रहे हैं, डामर वाली सड़कें पिघल रही हैं और गाड़ियों की रफ्तार कम करने के लिए अस्थायी नियम लागू करने पड़ रहे हैं. सिर्फ जुलाई की शुरुआत में ही, देश के हाईवे के सात हिस्सों को कुछ समय के लिए पूरी तरह बंद करना पड़ा था.

जर्मनी के हाइवे को संभालने वाली कंपनी ‘ऑटोबान जीएमबीएच' के प्रवक्ता ने डीडब्ल्यू को बताया, "इसकी वजह अक्सर बिटुमिन होती है, जो डामर को जोड़ने वाला पेट्रोलियम आधारित गोंद जैसा पदार्थ है. यह लचीला होता है और लगभग 60 डिग्री सेल्सियस का उच्च तापमान पहुंचते ही नरम पड़ने लगता है.”

जर्मनी के पास नए हाईवे बनाने के लिए नहीं है पैसा

देश की ज्यादातर सड़कों को बनाने के लिए बिटुमिन का इस्तेमाल होता है. जब बाहर का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता है, तो धूप में काले डामर (सड़क) की सतह का तापमान बहुत तेजी से दोगुना या उससे भी ज्यादा हो सकता है और सड़क का आकार बिगड़ने लगता है. ऑटोबान जीएमबीएच के मुताबिक, आधुनिक और बिटुमिन-मुक्त डामर मिश्रणों का इस्तेमाल करने से इस तरह के नुकसान का खतरा काफी कम हो जाता है.

ऐसे में, जैसे-जैसे गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है और सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही बढ़ रही है, तो सवाल उठ रहा है कि क्या जर्मनी की सड़कें लंबे समय तक टिकने के लिए बनी हैं?

जर्मनी में अब भी पुरानी जलवायु के हिसाब से सड़कें बन रही हैंतस्वीर: Florian Gaertner/photothek.de/picture alliance

ऑटोबान को बढ़ती गर्मी के लिहाज से तैयार करने की जरूरत

नीना स्टेलसेनमुलर दक्षिण-पश्चिम जर्मनी में स्थित कार्ल्सरूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (केआईटी) में सड़क निर्माण प्रौद्योगिकी विभाग की प्रमुख और इंजीनियर हैं. वह कहती हैं, "जर्मनी की सड़कें इन दबावों (गर्मी और भारी ट्रैफिक) को झेलने के लिए बिल्कुल भी डिजाइन नहीं की गई हैं.”

उन्होंने बताया, "सड़क की सतह को पिछले 30 या 50 सालों के अनुभव के आधार पर बनाया जाता है, ना कि जलवायु में हो रहे उन बदलावों के आधार पर जो अब साफ तौर पर दिखाई दे रहे हैं.”

ऑटोबान जीएमबीएच के मुताबिक, फिलहाल सड़क की सतहों को माइनस 30 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 45 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को झेलने के हिसाब से डिजाइन करना पड़ता है. कंपनी का कहना है कि जर्मनी में पड़ने वाली कड़ाके की ठंड और तेज गर्मी का असर झेलने के लिए सड़कें इसी हिसाब से बनाई जाती हैं.

फिर भी, पूर्वी जर्मनी के कुछ इलाकों में साल 2040 तक कुछ दिनों का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस की इस अधिकतम सीमा को पार कर सकता है. यह बात जर्मनी की राष्ट्रीय मौसम सेवा (डीडब्ल्यूडी) के जलवायु मॉडलों पर आधारित है, जो यह मानकर चलते हैं कि आने वाले सालों में कार्बन उत्सर्जन अधिक रहेगा और ग्लोबल वॉर्मिंग लगातार बढ़ती जाएगी.

जर्मनी के केंद्रीय परिवहन मंत्रालय के अनुसंधान संस्थान (बीएएसटी) के एक अध्ययन से भी यह पता चला है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से, सड़क बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीजें अपनी सहनशक्ति की अधिकतम सीमा तक पहुंच रही हैं और अब कार्रवाई की सख्त जरूरत है. लेकिन ये शोध नतीजे अभी तक सड़कों की ऊपरी सतह को बदलने के लिए किसी बाध्यकारी नियम या कानून में तब्दील नहीं हो पाए हैं.

सड़क की ऊपरी सतह को फिर से तैयार करने का मौका

मौजूदा समय में बनाई जा रही हर सड़क को ऐसे तापमान को सहने लायक बनाने की जरूरत है जो शायद अब से कई दशकों बाद देखने को मिले.अच्छी बात यह है कि जर्मनी के इस महत्वपूर्ण सड़क ढांचे को मध्यम से लंबे समय के लिए गर्मी-रोधी बनाने के कई सारे तरीके मौजूद हैं.

जर्मनी में जब गर्मी तेज हो गई तो सड़कों को पिघले से रोकने के लिए उन पर पानी छिड़का गयातस्वीर: Jacob Schröter/dpa/picture alliance

साल 2019 के एक अध्ययन में पाया गया कि जब डामर में हल्के रंग का क्वार्टजाइट मिलाया गया, तो काला डामर 7 डिग्री सेल्सियस तक कम गर्म हुआ. इस अध्ययन में बीएएसटी भी शामिल था. रिसर्चरों ने सड़कों पर रिफ्लेक्टिव परतें चढ़ाने और जल्द से जल्द अन्य ठंडे पदार्थों का इस्तेमाल करने की सिफारिश की. हालांकि, इस अध्ययन में ऐसे बदलावों की लागत या उनके टिकाऊपन की जांच नहीं की गई थी.

ऑटोबान जीएमबीएच के मुताबिक, कुछ मामलों में निर्माण कार्य के दौरान पहले से ही हल्के रंग के पत्थरों का उपयोग किया जा रहा है. हालांकि, कंपनी का कहना है कि ऐसे पत्थरों का इस्तेमाल इस बात पर भी निर्भर करता है कि वे स्थानीय इलाकों में आसानी से उपलब्ध हैं या नहीं और उनकी कीमत कितनी है.

जर्मनी के अलग-अलग राज्य और शहर भी हल्के रंग की सड़कों की टेस्टिंग और प्लानिंग कर रहे हैं. इनमें पश्चिमी जर्मनी के ओबरहाउजन और श्टुटगार्ट शहर के साथ-साथ पूर्वी राज्य ब्रांडेनबुर्ग भी शामिल हैं. नीना स्टेलसेनमुलर के मुताबिक, डामर की सतह पर हल्के रंग के क्वार्टजाइट बिछाने से भी मदद मिल सकती है और यह तुरंत लागू किया जा सकने वाला एक व्यावहारिक तरीका होगा.

ग्लोबल मॉडल: डामर में पानी और रिफ्लेक्टिव कोटिंग

गर्मी से तपती और खराब होती सड़कों का सामना करने वाला जर्मनी अकेला देश नहीं है. दुनिया भर में बुनियादी ढांचे को बदलते मौसम के हिसाब से ढालने की सख्त जरूरत है.

मसलन, टोक्यो में सड़कों की मरम्मत करते समय पहले से ही ऐसी सतहों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो रोशनी को रिफ्लेक्ट करती हैं और पानी को सोखकर रखती हैं. ये तकनीकें सड़क की सतह के तापमान को 8 से 10 डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकती हैं. साल 2030 तक, टोक्यो में लगभग 245 किलोमीटर सड़कों पर ऐसी सतहें तैयार की जाएंगी.

अमेरिका के एरिजोना राज्य के फिनिक्स शहर में भी कई सड़कों पर हल्के रंग की कोटिंग लगाई जा चुकी है. ये धूप को ज्यादा रिफ्लेक्ट करती हैं, जिससे सड़कें कम गर्मी सोखती हैं. दिन के समय ये पारंपरिक सड़कों की तुलना में लगभग 6.7 डिग्री सेल्सियस तक ठंडी पाई गईं. लेकिन इसके साथ ही, इससे आसपास से गुजरने वाले पैदल यात्रियों के लिए हवा का तापमान काफी बढ़ गया.

हालांकि, कई अन्य देशों की तरह, जर्मनी भी गर्मी से होने वाले नुकसान से निपटने के लिए उपयुक्त सड़कों के व्यवस्थित इस्तेमाल से अभी काफी दूर है. भले ही औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, असली चुनौती यह बनी हुई है कि सड़क की सतह को कड़ाके की ठंड और बर्फीले सर्दियों के मौसम में भी टिकाऊ और स्थिर बनाए रखना है.

बतौर नीना स्टेलसेनमुलर, बिटुमिन के विकल्प के तौर पर ऐसे हाई-परफॉर्मेंस बाइंडर विकसित किए जा रहे हैं जो कड़ाके की ठंड और तेज गर्मी, दोनों ही चरम स्थितियों को झेल सकें.

उन्होंने समझाया, "एक तो ये बहुत ज्यादा लचीले होते हैं. इसलिए, कम तापमान में भी ये ठंड से होने वाले दबाव को झेल सकते हैं. लेकिन साथ ही, इनमें बहुत ज्यादा मजबूती भी होती है, जिससे ये ज्यादा तापमान में भी पिघलने या मुड़ने से बच जाते हैं.”

नियम बनाने में हो रही देर

नीना स्टेलसेनमुलर के मुताबिक, जलवायु के अनुकूल सड़कें बनाने पर पहले से ही काफी रिसर्च हो चुके हैं, लेकिन जब तक रिसर्च के इन नतीजों को असल में सरकारी नियमों में शामिल किया जाएगा और इनके आधार पर नियमित रूप से सड़कें बनने लगेंगी, उसमें सालों, यहां तक कि दशक भी लग सकते हैं. मुझे नहीं लगता कि अगले दो या तीन सालों में इसे लागू किया जा सकेगा.”

यूरोप चुका रहा है भीषण गर्मी की कीमत

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अगर परिवहन मंत्रालय और सड़क-निर्माण से जुड़े अधिकारी इस मुद्दे पर जोर दें, तो इंफ्रास्ट्रक्चर को गर्मी के हिसाब से तैयार करने का काम तेजी से हो सकता है. ठीक ऐसा ही तब भी हुआ था, जब डामर के मिश्रणों के निर्माण में प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों की सीमाओं को सख्त किया गया था.”

साल 2025 में, जर्मनी के परिवहन मंत्रालय ने इस मुद्दे पर आधिकारिक रूप से नया निर्देश लागू होने से पहले ही कहा था कि कम जहरीली सतहों का इस्तेमाल ‘जितना जल्दी हो सके' शुरू किया जाए.

उन्होंने कहा, "उन तय सीमाओं को पूरा करने के लिए वाकई बड़ी जल्दबाजी और गंभीरता का माहौल था. और यहां यह बात सही साबित हुई, जहां महज कुछ ही सालों के भीतर नए नियम लागू कर दिए गए.”

स्टेलसेनमुलर ने कहा, "जलवायु परिवर्तन के अनुकूल और भविष्य के मौसम के लिहाज से सड़क निर्माण के लिए अधिकारियों को भी ऐसा ही रुख अपनाने की जरूरत है. अगर आप इस पर ज्यादा ध्यान दें, तो यकीनन कुछ ही सालों के भीतर नए तरह का डामर तैयार किया जा सकता है.”

इस खबर को प्रकाशित किए जाने तक, जर्मनी के परिवहन मंत्रालय ने प्रतिक्रिया के लिए डीडब्ल्यू के अनुरोध का कोई जवाब नहीं दिया था.

टिम शाउएनबेर्ग टिम, DW के जलवायु संवाददाताओं में से एक हैं. खासकर ब्रसेल्स और म्यूनस्टर से रिपोर्टिंग करते हैं.@tim_schauen
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