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विज्ञानसंयुक्त राज्य अमेरिका

धरती पर नन्हे डायनोसॉर का विकास क्यों नहीं हुआ

७ अगस्त २०२६

विशाल डायनोसॉर की कहानियां हम आए दिन विज्ञान कथाओं में सुनते हैं. धरती पर जीवों के विकास में उनमें बड़े सारे बदलाव आए क्या कभी डायनोसॉर की कोई ऐसी प्रजाति भी थी जो चूहे जितनी बड़ी हो?

अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में डायनोसॉर के मॉडल
डायनासॉर की प्रजाति का अब तक कोई नन्हा जीव नहीं मिला है. सबसे छोटा जीव भी कौवे के आकार का है तस्वीर: Alvaro Keding/AMNH/dpa/picture alliance

हम सब जानते हैं कि डायनोसॉर विशाल वन्यजीव थे. इनमें से लंबी गर्दन वाले कुछ शाकाहारी डायनोसॉर तो पृथ्वी के सबसे विशालकाय शरीर वाले जीव रहे थे. 70 से 90 टन तक वजनी इन डायनोसॉर की ऊंचाई 100 फीट तक थी. सवाल है कि क्या छोटे चूहे के आकार के डायनोसॉर भी थे. अब तक तो हमें ऐसे डायनोसॉर के बारे में जानकारी नहीं है.

वो कंकाल जिसने खोला डायनासोरों का राज

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बड़े जानवर छोटे क्यों होते जा रहे हैं

एक नई रिसर्च में इसका पता लगाने की कोशिश की गई है. वैज्ञानिकों ने सभी कशेरुकी जीवों में शरीर के आकार की उत्पत्ति को जानने के लिए गणितीय मॉडल का इस्तेमाल किया. उन्होंने तय किया कि ऊर्जा और शारीरिक विकास स्तनधारियों, उड़ने वाली चिड़ियों और कछुओं के आकार को तय कर सकते हैं. हालांकि अगर डायनोसॉर के उड़ने वाले वंशजों को अलग कर दें तो बेहद छोटे डायनोसॉर की अनुपस्थिति समझ में नहीं आती. यानी उत्पत्ति के दौर में सिर्फ बड़े डायमोसॉर ही क्यों रहे डायनोसॉर की छोटी प्रजातियां क्यों नहीं पनपीं.

स्थनधारियों ने रोका डायनोसॉर को

रिसर्चरों ने माना कि इसके पीछे दूसरे कारक भी काम कर रहे हैं. उन्होंने अनुमान लगाया कि छोटे जानवरों के लिए पारिस्थितिकी में जो जगह थी उसे शुरुआती स्तनधारी ने बड़ी कुशलता से भर दिया. उस समय के ज्यादातर स्तनधारी छछूंदर के आकार के छोटे जीव थे. उनकी मौजूदगी ने डायनोसॉर को छोटे आकार के जीवों में ढलने से रोक दिया खासतौर से उस समय के वातावरण में.

डायनोसॉर के बहुत सारे जीवाश्म मिले लेकिन नन्हें डायनासॉर का कोई जीवाश्म अब तक नहीं मिला है तस्वीर: Mick Ellison/AMNH/dpa/picture alliance

न्यू जर्सी की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में जीवाश्म विज्ञानी श्टेफानी लेच्की का कहना है, "जीवित प्राणियों और जीवाश्म रिकॉर्डों के देखने के बाद हम जानते हैं कि ज्यादातर जीव समूहों में ऐसे सदस्य भी हैं जिनके शरीर का आकार बहुत छोटा है और ये छोटे जीव उस इकोसिस्टम पर हावी रहते हैं."

लेच्की इवॉल्यूशन जर्नल में छपी रिसर्च रिपोर्ट की सहलेखिका हैं. उनका कहना है, "छोटे जीवों को कम संसाधनों की जरूरत होती है और बड़े जीवों की तुलना में वे प्रजनन करने लायक वयस्क जल्दी हो जाते हैं और बच्चे पैदा करने लगते हैं."

सबसे छोटा डायनोसॉर कितना बड़ा है

सबसे छोटे डायनोसॉर में कौवे के आकार के माइक्रोरैप्टर शामिल हैं. इनका वजन महज 15 औंस यानी लगभग 430 ग्राम था. इसी तरह से 730 ग्राम वजनी फ्रुटाडेंस, 530 ग्राम वाले एंकियोर्निस भी इनमें शामिल हैं. ये सब आज की सबसे छोटी चिड़ियों मसलन बी हमिंगबर्ड (1.75 ग्राम) की तुलना में काफी बड़े हैं. सबसे छोटा स्तनधारी एट्रस्कन छछूंदर (लगभग 1.8 ग्राम)  या सबसे छोटा सरीसृप ड्वार्फ गेको (0.15 ग्राम) भी इनसे काफी छोटा है.

रिसर्चरों की टीम के सह प्रमुख रोजर बेनसन का कहना है, "ज्यादातर जीवित प्रजातियां छोटी हैं, हमसे काफी छोटी हैं और सबसे छोटे डायनोसॉर की तुलना में भी काफी छोटी हैं." इनमें चिड़ियों की करीब 90 फीसदी और स्तनधारियों की 75 फीसदी प्रजातियां शामिल हैं. बेनसन न्यूयॉर्क के अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में डायनोसॉर जीवाश्म विज्ञान के क्यूरेटर हैं.

डायनोसॉर की कई प्रजातियां चिड़ियों में बदल गईं तस्वीर: Zhao Chuang/Peking Natural Science Organization/picture alliance/dpa

बेनसन का कहना है, "चूहा, छछूंदर, चमगादड़, सॉन्गबर्ड, ज्यादातर छिपकलियां, मेंढक बहुत सारी छोटी प्रजातियां हैं. इससे पता चलता है कि छोटे शरीर वाले जीवों के लिए इलाके मौजूद थे. छोटे डायनोसॉर के नहीं होने के मतलब है कि प्रचुरता वाले इलाके पहले ही उनके लिए बंद हो चुके थे." यानी डायनोसॉर के छोटे होने से पहले ही दूसरे जीवों ने उन जगहों पर कब्जा कर लिया था.

डायनोसॉर के मिटने के बाद बड़े हुए स्तनधारी

डायनोसॉर पहली बार लगभग 23 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर आए थे. धीरे धीरे वे धरती के सबसे दबंग प्राणि बन गए. उनका वह दर्जा तब तक बना रहा जब तक कि 6.6 करोड़ साल पहले पृथ्वी से टकराए धूमकेतू ने उनका अस्तित्व मिटा दिया.डायनोसॉर के खत्म होने के बाद धीरे धीरे पृथ्वी पर जीवन लौटा. डायनोसॉर के दौर में स्तनधारी उचित पारिस्थितिकीय इलाकों में रहते थे जो उनके जैसे छोटे जीवों और बीज खाने वाले दूसरे जीवों के लिए बढ़िया थी.

लेच्की का कहना है, "इस बात के बहुत आसार हैं कि छोटे आकार वाले शुरुआती स्तनधानरियों ने डायनोसॉर से बाजी मार ली और उन्हें छोटे आकार के जीवों में ढलने नहीं दिया. इसी तरह से बड़े डायनोसॉर ने शुरुआती स्तनधारियों को बड़े आकार वाले जीवों में ढलने नहीं दिया."

डायनोसॉर की प्रजातियों में कई तरह के जीव हैं लेकिन उनमें कोई भी चूहे जितना छोटा नहीं है तस्वीर: Jose Antonio Penas/StockTrek Images/IMAGO

जब धूमकेतू की टक्कर से ये बड़े डायनोसॉर खत्म हो गए तो उसके बाद ही स्तनधारियों का विकास उन पारिस्थितिकीय जगहों में बड़े आकार वाले जीवों में हुआ जहां पहले बड़े शाकाहारी और शिकारी डायनोसॉर का प्रभुत्व था.

छोटे डायनोसॉर के नहीं होने का एक और संभावित कारण यह है कि शायद उनका अस्तित्व था लेकिव उनके जीवाश्म मिट गए. रिसर्चरों का कहना है कि इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि डायनोसॉर के जीवाश्म मिलने वाली जगहों पर बहुत सारे छोटे जीवों के जीवाश्म भी सुरक्षित मिले हैं.

गणितीय मॉडल

बेनसन का कहना है कि गणितीय मॉडल इस बात का पूर्वानुमान देते हैं कि विकास की प्रक्रिया ने कैसे शरीर के आकार किस तरह प्रभावित किया. यह अनुमान इस आधार पर लगाया जाता है कि कोई जीव पारिस्थितिकीय तंत्र के संसाधनों से कितनी ऊर्जा हासिल करता है और उस ऊर्जा के कितने हिस्से को प्रजनन के माध्यम से संतान में बदलता है.

रिसर्च में पता चला कि डायनोसॉर इन मॉडलों को गलत साबित करते हैं. हालांकि पंख वाले डायनोसॉर से विकसित परिंदे जो पहली बार 15 करोड़ साल पहले नजर आए थे, उन्होंने इन मॉडलों की पुष्टि की. हालांकि उड़ान नहीं भरने वाले पक्षी इनके अपवाद रहे. सांप और मगरमच्छ प्रजाति के जीव भी इन मॉडलों के अनुरूप नहीं थे.

जिन डायनोसॉर से चिड़ियों का विकास हुआ वे थेरोपॉड वंश के थे जिनमें टिरैनोसॉरस रेक्स जैसी प्रजातियां हैं. इनका आकार करीब 12 मीटर तक लंबा और 8 टन तक वजन था. उड़ान नहीं भरने वाले पंछियों का आकार भी काफी बड़ा था. उदाहरण है एलिफैंट बर्ड जो करीब एक सदी पहले तक रहता था और उसका वजन 500 किलो तक था.

बेनसन का कहना है, "परिंदे 13 करोड़ साल पहले तक उड़ान भरने के लिए अनुकूलित होते रहे और बहुत जल्द छोटे हो गए. हमारा मानना है कि उड़ान भरने की वजह से पंछी पारिस्थितिकीय होड़ और अपने छोटे आकारों से बाहर निकल गए. यही वजह है कि जीवित पंछियों में काफी अधिक जैवविविधता दिखती है, जिसमें 12,000 प्रजातियां हैं."

निखिल रंजन निखिल रंजन एक दशक से डॉयचे वेले के लिए काम कर रहे हैं और मुख्य रूप से राजनैतिक विषयों पर लिखते हैं.
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