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डॉनल्ड ट्रंप कर रहे हैं ब्रिक्स को मजबूत?

निक मार्टिन अनुवादः सोनम मिश्रा
२७ अगस्त २०२५

डॉनल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स देशों पर काफी भारी टैरिफ लगाए हैं. ऐसे में अब जब भारत, चीन और रूस तिआनजिन में बड़ी बैठक की तैयारी कर रहे हैं, तो सवाल है – क्या ट्रंप की वजह से ये देश आपस में और करीब आ गए हैं?

Russland Kasan 2024 | 16. BRICS-Gipfel mit Xi Jinping, Wladimir Putin und Narendra Modi
तस्वीर: Alexander Shcherbak/TASS/dpa/picture alliance

डॉनल्ड ट्रंप पर लगातार यह आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने ब्रिक्स देशों पर बाकी देशों की तुलना में ज्यादा टैरिफ लगाकर, उनके आपसी संबंधों में काफी मजबूती ला दी है. ब्रिक्स यानी ऐसे देशों का समूह जिनकी अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है.

ब्रिक्स का सबसे बड़ा सदस्य चीन अगर ट्रम्प से समझौता नहीं कर पाया तो उस पर 145 फीसदी तक टैरिफ लग सकता है.  ब्राजील और भारत पर 50 फीसदी का टैरिफ लगा है. भारत पर यह टैरिफ यह कह कर लगा है कि उसने रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा. इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका पर भी 30 फीसदी टैक्स लगाया गया है. यहां तक कि ब्रिक्स के नए सदस्य होने के कारण मिस्र जैसे देशों पर भी टैरिफ लगाया जा सकता है.

ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले सात महीनों में कई बार चेतावनी दी है कि अगर कोई भी देश ऐसी नीतियों का समर्थन करता है, जिन्हें वह "अमेरिका-विरोधी” मानते है, तो उस पर कड़े कदम उठाए जाएंगे. इसमें साफ तौर पर ब्रिक्स देशों की तरफ इशारा किया गया, जो अमेरिका की वैश्विक ताकत को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं.

ट्रंप की वजह से ब्रिक्स को मिला एक ‘साझा मकसद'

भारत के पूर्व वाणिज्य विभाग के अधिकारी, अजय श्रीवास्तव का मानना है कि ट्रंप के लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ से ब्रिक्स देशों को कोई खास डर नहीं है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि इस तरह के टैरिफ ब्रिक्स देशों को एक साझा मकसद देते हैं – यानी अमेरिका पर अपनी निर्भरता को कम करना.

इन अतिरिक्त शुल्कों की वजह से ब्रिक्स देशों में नाराजगी है. अब यह देश आपसी व्यापार को अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में बढ़ा रहे हैं ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटा सकें. ब्रिक्स के केंद्रीय बैंक भी सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं ताकि वे डॉलर से छुटकारा पा सके.

डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफ लगाने के बाद ब्रिक्स देशों के रिश्ते में गर्माहट बढ़ गई हैतस्वीर: Jonathan Ernst/REUTERS

ट्रंप ने भले ही आरोप लगाया हो कि "ब्रिक्स खत्म हो चुका है,” लेकिन एक आलोचक ने अमेरिकी राष्ट्रपति पर "रणनीतिक गलती” करने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि ट्रंप ने अलग-अलग उद्देश्यों वाले लचर समूह को एक मजबूत संगठन में बदल दिया है.

वॉशिंगटन पोस्ट में लिखे एक लेख में काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस थिंक टैंक के विदेश नीति विशेषज्ञ मैक्स बूट ने कहा है कि ट्रंप "अमेरिकी ताकत को कमजोर कर रहे हैं, क्योंकि वे अमेरिका के दोस्तों को उनके दुश्मनों के साथ मिला रहे हैं.” यानी ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और भारत जैसे देश अब चीन और रूस के करीब आ रहे हैं.

चीन में मिलेंगे शी, मोदी और पुतिन

ब्रिक्स देशों की बढ़ती एकजुटता का नजारा जल्द ही तिआनजिन (उत्तरी चीन) में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में दिखेगा. यह बैठक रविवार से शुरू होगी. जहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी करेंगे. इसके अलावा ग्लोबल साउथ के लगभग 20 और देशों के नेता भी इसमें शामिल होंगे. ध्यान देने वाली बात यह है कि मोदी सात साल में पहली बार चीन की धरती पर कदम रखेंगे.

शंघाई सहयोग संगठन के बैठक पर इस बार पूरी दुनिया की नजर हैतस्वीर: Li Ran/Xinhua/picture alliance

सम्मेलन से पहले, रूस लगातार कोशिश कर रहा है कि चीन, रूस और भारत छह साल बाद पहली बार त्रिपक्षीय वार्ता करें. इस पहल का मकसद ब्रिक्स गठबंधन को और मजबूत करना है. रूस का मानना है कि ब्रिक्स के तीन सबसे बड़े देशों के बीच इस तरह की उच्च-स्तरीय बातचीत फिर से शुरू करने से पुराने तनावों को कम करने में मदद मिलेगी, खासकर भारत और चीन के बीच. साथ ही, इससे पश्चिमी देशों के सामने एक मजबूत और एकजुट संगठन पेश किया जा सकेगा.

भारत ने बदला चीन को लेकर अपना रुख

ट्रंप के भारी-भरकम टैरिफ ने भारत को चीन के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत करने की तरफ धकेल दिया है. दोनों देशों ने सीधी उड़ानें फिर शुरू की हैं, वीजा नियम भी आसान किए हैं और व्यापार पर  फिर से बातचीत बढ़ाई है. साथ ही, लगभग 3,500 किलोमीटर लंबे वास्तविक सीमा क्षेत्र पर चले आ रहे विवादों को सुलझाने के लिए भी बातचीत शुरू की गई है.

पिछले हफ्ते चीनी विदेश मंत्री, वांग यी की भारत यात्रा के दौरान, बीजिंग ने भारत को दुर्लभ खनिज की आपूर्ति बढ़ाने पर सहमति दी. इन खनिजों की 85 फीसदी से भी ज्यादा प्रोसेसिंग चीन के पास है, जबकि भारत को स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और रक्षा तकनीकों के लिए तुरंत जरूरत है.

हालांकि, भारत और चीन ने एक-दूसरे को 2026 और 2027 ब्रिक्स सम्मेलनों की मेजबानी में समर्थन दिया है. हालांकि फिर भी भारत के चीन की महत्वाकांक्षाओं पर शक के चलते उनके रिश्तों में बड़े सुधार की उम्मीद कम ही है.

लंदन स्थित कैपिटल इकनॉमिक्स के डिप्टी चीफ इमर्जिंग मार्केट्स इकोनॉमिस्ट, शिलन शाह के मुताबिक, चीन के पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ रिश्ते और तिब्बती पठार पर बनाए जा रहे उसके हाइड्रो पावर डैम से भारत असहज है. इसके अलावा, शाह ने अपने रिसर्च नोट में लिखा कि "सस्ते चीनी आयात की बाढ़” भारत के घरेलू उद्योग को मजबूत करने की कोशिशों को कमजोर करती है.

भारत का चीन पर अविश्वास और अमेरिका के साथ उसके पुराने रिश्ते ब्रिक्स की मजबूती की कोशिशों को चोट पहुंचा सकते हैं. भारत अब भी अमेरिकी बाजार और तकनीक पर काफी हद तक निर्भर है. 2024 में भारत का अमेरिका को निर्यात 77.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि रूस और चीन को किया गया निर्यात इससे काफी कम रहा.

दूसरे ब्रिक्स देशों ने भी चीन से रिश्ते मजबूत किए

ब्राजील ने भी इस महीने की शुरुआत में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा के बीच हुई फोन कॉल के दौरान चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने की कोशिश की. चीन, ब्राजील का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और उसका 26 फीसदी निर्यात वहां जाता है, जो अमेरिका की तुलना में दोगुना है.

मई में रूस के विक्ट्री डे परेड में पुतिन और शी की मौजूदगी ने मास्को और बीजिंग के बीच गहराते रणनीतिक रिश्तों को और पक्का कर दिया. क्रेमलिन के अनुसार, अब रूस और चीन के बीच 90 फीसदी से भी अधिक का व्यापार युआन और रूबल में हो रहा है.

दूसरी ओर, दक्षिण अफ्रीका अपने ब्रिक्स वादों पर अब भी अडिग है और ट्रंप के दबाव के बावजूद एक अलग राह चुनने के संकेत दे रहा है.

दक्षिण अफ्रीका के इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल डायलॉग की सीनियर रिसर्च एसोसिएट, सनूषा नायडू ने डीडब्ल्यू से कहा, "मुझे नहीं लगता कि दक्षिण अफ्रीका अपने किसी भी ब्रिक्स वादे से पीछे हटना चाहता है, खासकर वैश्विक शासन सुधार, तकनीक, कृषि, शैक्षणिक साझेदारी और व्यापार से जुड़े सहयोग में.”

ब्रिक्स देशों की अलग-अलग महत्वाकांक्षा

चार देशों के समूह से शुरू हुआ ब्रिक्स अब बढ़कर दस सदस्य देशों तक पहुंच चुका है. सऊदी अरब अब तक यह तय नहीं कर पाया है कि वह इससे जुड़ना चाहता है या नहीं. हालांकि अलग-अलग देशों के अलग-अलग हितों की वजह से यह संगठन धीरे-धीरे बंटा हुआ नजर आ रहा है, जिससे इसकी बड़ी योजनाएं भी सीमित रह सकती हैं. इसके अलावा यह समूह दिनोंदिन और सत्तावादी होता जा रहा है.

वाणिज्य विभाग के पूर्व अधिकारी अजय श्रीवास्तव ने नई दिल्ली में ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव की स्थापना की है, उनका कहना है कि ब्रिक्स का मकसद "एकता नहीं बल्कि व्यापार, वित्त और सप्लाई चेन में व्यावहारिक सहयोग” है.

ट्रंप ने जो चाहा, टैरिफ ने उसका उल्टा किया

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हाल के सालों में ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार, ब्रिक्स और जी7 देशों के बीच होने वाले व्यापार से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा है. हालांकि इसमें ज्यादातर हिस्सा तेल और गैस का रहा है. बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के शोध के मुताबिक, दिलचस्प यह है कि ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार में बाधाएं ग्लोबल नॉर्थ के देशों के बीच मौजूद बाधाओं से भी कई अधिक हैं.

कंसल्टिंग फर्म ने ऐसी योजनाओं की ओर भी इशारा किया जो दिखाते हैं कि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक सहयोग तेजी से आगे बढ़ रहा है. एंटी-डंपिंग और अन्य व्यापारिक रोक-टोक को कम करना, पूरे ब्रिक्स समूह के लिए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की दिशा में कदम, विश्व व्यापार संगठन में सुधार के लिए सर्वसम्मति से समर्थन और ब्रिक्स देशों के बीच बढ़ता विदेशी निवेश, ये सब इनमें शामिल हैं.

ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की तैयारी

हालांकि ब्रिक्स की सारी महत्वाकांक्षाएं तुरंत पूरी नहीं होंगी, लेकिन सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज के मिहाएला पापा का मानना है कि ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार अब और भी तेजी से बढ़ सकता है.

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "हम नए व्यापारिक कदमों को लेकर राजनीतिक समर्थन देख सकते हैं, जैसे ‘बाय ब्रिक्स' कैंपेन, ब्रिक्स अनाज एक्सचेंज जैसी परियोजनाएं और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ाने की योजनाएं.”

रूस की सुझाई एक साझा ब्रिक्स मुद्रा, जो डॉलर को चुनौती दे सके, अभी रुकी हुई है. इसका मतलब है कि भविष्य पूरी तरह अलग वित्तीय सिस्टम पर नहीं, बल्कि कई तरह के आपस में जुड़े नेटवर्क पर आधारित हो सकता है.

श्रीवास्तव का अनुमान है कि डॉलर आने वाले सालों तक "प्रमुख” मुद्रा बना रहेगा, लेकिन युआन, रुपया और रूबल में लेन-देन की समानांतर प्रणालियों को बढ़ावा मिल सकता है. उनके अनुसार, "इससे डॉलर की गद्दी नहीं गिरेगी, लेकिन धीरे-धीरे उसके एकाधिकार को कम किया जाएगा.”

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