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श्रीलंका में सामूहिक कब्रों की खुदाई से क्या चाहते हैं तमिल

जीवन रवीन्द्रन श्रीलंका
१८ अगस्त २०२५

श्रीलंका के चेम्मानी इलाके में सामूहिक कब्रों की खुदाई ने एक बार फिर से देश के खूनी इतिहास को सामने खड़ा कर दिया है. ऐसे में तमिल समुदाय अंतरराष्ट्रीय समाज से अपील कर रहा है कि वह इस मामले में उनकी मदद करें.

गुमशुदा तमिल लोगों के परिवारजन कई सालों से करते आ रहे हैं पूरी जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग
गुमशुदा तमिल लोगों के परिवारजन कई सालों से करते आ रहे हैं पूरी जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांगतस्वीर: AFP/Getty Images

श्रीलंका में जब भी किसी सामूहिक कब्र की खुदाई होती है, थम्बीरासा सेलवरानी पूरी रात सो नहीं पाती हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "हमें अब तक नहीं पता कि हमारे परिजनों के साथ क्या हुआ था. जब-जब  खुदाई होती है, मुझे घबराहट होने लगती है.”

54 वर्षीय सेलवरानी अपने पति मुथुलिंगम ज्ञानसेल्वम की तलाश में बेचैन हैं, जो मई 2009 में लापता हो गए थे. उस समय श्रीलंकाई गृहयुद्ध के अंत में उन्होंने सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. दशकों तक चले इस संघर्ष का अंत लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) की हार के साथ हुआ.

तब से अब तक कई जगहों सामूहिक कब्रें खोदी जा चुकी है. पिछले तीन महीनों से पुरातत्वविद चेम्मानी इलाके (श्रीलंका के उत्तरी प्रांत की राजधानी जाफना शहर के बाहरी हिस्से) में खुदाई कर रहे हैं. अब तक इस खुदाई में 140 कंकाल मिल चुके हैं, जिसमें बच्चों के कंकाल भी शामिल हैं.

उथली सी कब्र में मिला लाशों का 'ढेर'

सन 1998 से ही चेम्मानी में सामूहिक कब्र होने का अंदेशा था. उस समय कृष्णांथी कुमारस्वामी नामके एक पूर्व सेना कॉर्पोरल पर एक स्कूली छात्रा के बलात्कार और हत्या के मामले में मुकदमा चल रहा था. उसकी सुनवाई के दौरान आरोपी ने बताया था कि जिस इलाके में पीड़िता लड़की का शव मिला है, वहां उसके साथ-साथ सैकड़ों और लाशें भी दफन हैं.

श्रीलंका के चेम्मानी इलाके में पिछले तीन महीने से हो रही है सामुहिक कब्रों की खुदाई तस्वीर: AFP/Getty Images

डीडब्ल्यू से बातचीत में वकील वी. एस. निरंजन बताते हैं कि वे उन परिवारों के साथ काम कर रहे हैं, जिनके रिश्तेदार 1990 के दशक में चेम्मानी के आसपास के इलाकों से लापता हो गए थे. अब तक की खुदाई में सामने आया है कि शवों को "बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के, अस्त-व्यस्त तरीके से, कब्रों में एक साथ डालकर” दफना दिया गया था. उन्होंने कहा, "हमें लगता है कि उनमें से कुछ को तो जिंदा ही दफना दिया गया था. क्योंकि अगर वे पहले से मृत होते तो उनके शव इस तरह मुड़े हुए नहीं होते.”

कई कंकालों के अंग टेढ़े-मेढ़े पाए गए हैं. कंकालों के साथ कई अन्य सामान भी मिले हैं. जैसे कि चप्पलें, बच्चे की दूध की बोतल और स्कूल बैग.

पुराने जख्म खुरच जाते हैं

जाफना स्थित अदायालम सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की कार्यकारी निदेशक, अनुशनी आलागराजाह ने बताया कि चेम्मानी का इतिहास "बहुत ही दर्दनाक और आघात भरा है, खासकर जाफना के लोगों के लिए.”

आलागराजाह ने डीडब्ल्यू को बताया, "उस समय हमारे कई दोस्तों के भाई, पिता और बहनें लापता हो गई थी. अब इस घटना को 25 साल से भी अधिक हो गया है. यह सिर्फ परिवारों के ही नहीं, बल्कि पूरी कम्युनिटी, पूरे जाफना के पुराने घावों को फिर से हरा कर रहा है. यह याद दिलाता है कि आप ऐसे घाव कभी भूल नहीं सकते.”

अब तक यहां से 140 से भी अधिक लोगों के अवशेष निकाले जा चुके हैं तस्वीर: AFP/Getty Images

चेम्मानी की खुदाई अब तक श्रीलंका में हुई सामूहिक कब्रों की खुदाई की सबसे चर्चित जांच बन गई है. इसने अंतरराष्ट्रीय निगरानी की मांगों को भी जन्म दिया है, खासकर देश के तमिल समुदाय के बीच.

जून में इस जगह का दौरा करते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त, फोल्कर ट्युर्क ने कहा कि "श्रीलंका ऐसे जवाबदेह तंत्रों के साथ संघर्ष करता रहा है, जिन पर पीड़ितों का भरोसा और विश्वास हो. यही कारण है कि श्रीलंकाई लोग न्याय के लिए बाहर की ओर देख रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहायता की मांग कर रहे हैं.”

विदेशी मदद लेने की मांगें

तमिल कार्यकर्ताओं ने फोल्कर ट्युर्क की यात्रा के दौरान विरोध प्रदर्शन किया. थंबिरासा सेल्वारानी भी इस कार्यक्रम में शामिल हुई थी और उन्होंने ट्युर्क से सीधे मुलाकात की थी. उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें श्रीलंकाई न्याय व्यवस्था पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है. 

सेल्वारानी, अम्पारा जिले में स्थित एसोसिएशन ऑफ रिलेटिव्स ऑफ एनफोर्स्ड डिसअपीयरेंसेस की अध्यक्ष हैं. वह चाहती हैं कि उनके जिले में भी सामूहिक कब्रों की खुदाई की जाए.

श्रीलंका का तमिल समुदाय अंतरराष्ट्रीय समाज से अपील कर रहा है कि वे इस मामले में उनकी मदद करेंतस्वीर: Akila Jayawardena/Matrix Images/picture alliance

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "हमें डर लगता है. हमें नहीं पता कि अगली बार किसका शव मिलेगा, किसकी पहचान होगी. मैं दिन-रात इस बारे में ही सोचती रहती हूं. मुझे न नींद आती है, न खाना खाया जाता है. मैं बहुत परेशान महसूस करती हूं.”

सेल्वारानी ने बताया, "पिछले 17 सालों से, जब-जब राष्ट्रपति बदलते हैं. हम उनसे पूछते आ रहे हैं कि हमारे बच्चों और परिजनों के साथ क्या हुआ था.” लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी रही है. उनका कहना है कि जब भी वह विरोध प्रदर्शनों में जाती हैं, श्रीलंका की आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) के अधिकारी उन्हें डराते-धमकाते हैं. उन्होंने बताया, "वे कहते हैं – ‘तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए, तुम्हारे रिश्तेदार मर चुके हैं, फिर भी तुम यहां-वहां क्यों जाती रहती हो?'”

सरकार नई, मुद्दे वही पुराने

श्रीलंका की परंपरागत वंशवादी राजनीति से अलग हटकर, सितंबर 2024 में देश ने वामपंथी नेता, अनुरा कुमारा दिसानायके को राष्ट्रपति चुना. लेकिन वकील निरंजन अब भी संदेह में हैं. उनका कहना है कि "इतिहास से साफ है” कि सरकारों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. वे हमेशा से अंतरराष्ट्रीय निगरानी का विरोध करती रही हैं.

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "यह सरकार जातीय समस्याओं को समझती ही नहीं है. वे सोचते हैं कि अगर हम भ्रष्टाचार खत्म कर दें तो देश में शांति आ जाएगी. लेकिन वे यह नहीं समझते कि जातीय समस्याएं भी इस देश के कर्ज में डूबने का एक बड़ा कारण हैं.”

मानवाधिकार वकील और श्रीलंका की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पूर्व आयुक्त, अम्बिका सत्कुनानाथन भी इस अविश्वास पर सहमति जताती हैं. उन्होंने कहा, "इतिहास में लगभग हर श्रीलंकाई सरकार अलग-अलग जवाबदेही प्रक्रियाओं में अंतरराष्ट्रीय मदद लेने से कतराती रही है.”

विश्व युद्ध के बाद चौथे दशक की कहानी

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सत्ता में आने से पहले ही राष्ट्रपति दिसानायके ने कहा था कि वे युद्ध अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा नहीं चलाएंगे. डीडब्ल्यू से बात करते हुए सत्कुननाथन ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़ितों को राज्य पर भरोसा नहीं है कि वह उन्हें न्याय दिलाने के लिए तत्पर हैं.

श्रीलंका में उम्मीद रखना घातक

पिछले महीने मानवाधिकारों पर काम करने वाले एनजीओ 'इंटरनेशनल कमेटी ऑफ ज्यूरिस्ट्स' (आईसीजे) ने मांग की कि श्रीलंका में "अंतरराष्ट्रीय कानून और मानकों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय निगरानी और पीड़ित-केंद्रित जांच” की जाए.

लेकिन अदायालम सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की आलागराजाह का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि दिसानायके की सरकार अंतरराष्ट्रीय निगरानी की वकालत करेगी. उन्होंने यह भी साफ किया कि चेम्मानी में हो रही खुदाई से भी उन्हें "पिछली खुदाइयों” की तरह ही कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता है.

आलागराजाह ने बताया कि उन्होंने ऐसे परिवारों से भी मुलाकात की है, जो मानते हैं कि उन्हें चेम्मानी में अपने बच्चे मिलेंगे और जो "यह मानना चाहते हैं कि इस प्रक्रिया से उन्हें कुछ जवाब तो मिलेंगे” लेकिन साथ ही कहते हैं कि यहां जवाबों की उम्मीद रखना भी "खतरनाक” है.

आलागराजाह ने कहा, "उम्मीद हमेशा सबसे अच्छी चीज नहीं होती, क्योंकि यह आपको गहरी निराशा और तकलीफ देती है, खासकर इस देश में.”

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