सांस्कृतिक दूरियां मिटाने वाले बने 2025 के गोएथे मेडल विजेता
२९ अगस्त २०२५
इस साल तीन लोगों को प्रतिष्ठित गोएथे मेडल से सम्मानित किया गया है. इनमें से एक हैं जेल में बंद तुर्की के सांस्कृतिक प्रचारक एवं सामाजिक न्याय कार्यकर्ता ओस्मान कवाला. दूसरी हैं चीनी स्कॉलर और जर्मन भाषा विशेषज्ञ ली युआन. वहीं तीसरे हैं बेल्जियम के पुरातत्वविद् और लेखक डाविड फान रेब्रुक.
इनमें से कोई सांस्कृतिक बाधाओं को खत्म कर रहा है, कोई मानवाधिकारों और लोकतंत्र के लिए लड़ रहा है, तो कोई सभी लोगों को समझ में आने वाली आम भाषा खोज रहा है. इन तीनों को जर्मनी की वैश्विक सांस्कृतिक संस्था ‘गोएथे इंस्टीट्यूट' की ओर से अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान में उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया है.
गोएथे मेडल पुरस्कार समारोह का आयोजन 28 अगस्त को जर्मनी के वाइमार शहर में हुआ. यह दिन प्रसिद्ध जर्मन लेखक और बहुमुखी प्रतिभा के धनी योहान वोल्फगांग फॉन गोएथे का जन्मदिवस भी है.
आजीवन कारावास की सजा के बावजूद प्रभावशाली
ओस्मान कवाला आजीवन कारावास की सजा पाने के बावजूद प्रभावशाली बने हुए हैं. गोएथे इंस्टीट्यूट ने ओस्मान कवाला के बारे में लिखा, "समाज के प्रति उनका जीवन भर का समर्पण इस विश्वास पर आधारित है कि कला और संस्कृति लोगों को आपस में जोड़ने और बातचीत में अहम भूमिका निभाती है. इससे वे एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझते हैं. ऐसा समाज बनाते हैं जहां हर कोई सुरक्षित और बराबर महसूस करता है.”
वर्ष 2002 में कवाला ने तुर्की के गैर-सरकारी संगठन ‘अनादोलु कुल्तुर' की स्थापना की थी. यह एनजीओ कला एवं संस्कृति, नागरिक समाज, और मानवाधिकारों की बात करता है. यह खासकर पिछड़े इलाकों में विभिन्न प्रोजेक्ट को सहायता प्रदान करता है, ताकि इन जगहों के लोगों को भी मुख्यधारा में लाया जा सके.
कवाला ने सांस्कृतिक विरासत संरक्षण संघ (एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ कल्चरल हेरिटेज) की भी सह-स्थापना की. यह संस्था सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थलों और कलाकृतियों के संरक्षण के लिए काम करती है. आर्मेनिया-तुर्की सिनेमा प्लैटफॉर्म और तुर्की-आर्मेनिया यूथ सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा जैसे कार्यक्रमों की मदद से, कवाला ने दो देशों के बीच सांस्कृतिक रिश्ते को मजबूत किया है.
कवाला पिछले आठ वर्षों से तुर्की की इस्तांबुल जेल में बंद हैं. पुरस्कार स्वीकार करने उनकी पत्नी पहुंची. उन्होंने जेल से लिखे अपने एक बयान में कहा, "मेरा हमेशा से मानना रहा है कि कला परियोजनाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों में आपसी सहयोग, पूर्वाग्रहों को दूर करने और दूसरों के प्रति आपसी समझ एवं सहानुभूति विकसित करने में मदद कर सकता है.”
राजनीतिक कारणों से कवाला को 2017 में पहली बार गिरफ्तार किया गया था. 2022 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. फिर भी, वह जेल से ही अनादोलु कुल्तुर के लिए काम कर रहे हैं. यह एनजीओ दक्षिण-पूर्वी तुर्की में दियारबाकिर आर्ट सेंटर चलाता है, जो कला, संस्कृति और नागरिक समाज को एक साथ लाने वाला महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंच बन गया है. कभी-कभी गोएथे इंस्टीट्यूट भी इस काम में सहयोग करता है.
2011 से चल रहे टैन्डम प्रोग्रामों की मदद से, कवाला ने तुर्की और यूरोप के सांस्कृतिक संस्थानों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सीमा पार सहयोग को भी बढ़ावा दिया है.
ज्यादा से ज्यादा लोगों को जर्मन सिखाने में एआई की मदद
जूरी के मुताबिक, चीनी लिंग्विस्ट ली युआन को भी गोएथे मेडल देने के लिए चुना गया. उन्हें यह सम्मान अंतर-सांस्कृतिक समझ को बेहतर बनाने और चीन में विदेशी भाषा के तौर पर जर्मन के विकास एवं संरक्षण में उनके अहम योगदान के लिए मिला है. वह चीन में जर्मन भाषा को सिखाने और जर्मन संस्कृति को समझने में लोगों की मदद करती हैं.
जर्मन सीखने से मिलेगा भारतीय युवाओं को रोजगार
चीन के हांग्जो स्थित जेजियांग यूनिवर्सिटी में जर्मन भाषा और जर्मन अध्ययन की प्रोफेसर युआन, जर्मन भाषा सीखने के लिए एआई के इस्तेमाल पर बहुत ही महत्वपूर्ण और नया काम कर रही हैं. एआई एक्सपर्ट के साथ मिलकर, युआन ने एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया है. इस प्रोजेक्ट में, वह डेटा विश्लेषण के नए तरीकों का इस्तेमाल करके यह पता लगा रही हैं कि जर्मन भाषा सीखने वाले छात्र सबसे ज्यादा कौन सी गलतियां करते हैं. इस रिसर्च के आधार पर, उन्होंने एक स्मार्ट फीडबैक टूल बनाया है, जिसे टेस्टिंग के तौर पर आजमाया जा रहा है.
ली युआन हमेशा नई चुनौतियों के लिए तैयार रहती हैं. 2003 में वह बर्लिन की टेक्निकल यूनिवर्सिटी में डॉक्टरेट की उपाधि लेने के लिए जर्मनी के बर्लिन शहर आईं. उन्होंने हुम्बोल्ट फेलोशिप के माध्यम से पोस्टडॉक्टोरल प्रोग्राम भी पूरा किया और सेमिनार में अपना रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया. वहां उन्हें अपनी रिसर्च के बारे में बोलने, साथ पढ़ने वाले छात्रों के सवालों का जवाब देने और खुद के अहम सवाल पूछने का मौका मिला. उन्होंने कहा, "वाद-विवाद की इस संस्कृति से मुझे काफी लाभ हुआ है.”
पहले से कई गुना ज्यादा देशों को वीजा-फ्री एंट्री क्यों दे रहा है चीन
प्रोफेसर बनने के बाद, युआन ने वैज्ञानिक अनुसंधान पर एक शुरुआती पाठ्यक्रम तैयार किया है, जो अब चीन में जर्मन भाषा की पढ़ाई करने वाले सभी छात्रों के लिए अनिवार्य है. ली युआन जर्मन भाषा के अध्ययन के लिए ऐसी किताबें भी तैयार करती हैं जो पूरे चीन में पढ़ाई जाती हैं. इनका मुख्य लक्ष्य विदेशी भाषा के छात्रों को वैश्विक मुद्दों पर सोचने के लिए प्रेरित करना है. फिलहाल, युआन जेजियांग यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट ऑफ जर्मन स्टडीज की प्रमुख हैं. साथ ही, सेंटर फॉर ग्लोबल कॉम्पिटेंस विभाग की जिम्मेदारी भी उनके पास ही है.
दूसरों की सुनना और उनसे जुड़ना
बेल्जियम के पुरातत्वविद् और लेखक डाविड फान रेब्रुक को भी गोएथे मेडल से सम्मानित किया गया है. वह कहते हैं, "लोगों का साक्षात्कार करने से ज्यादा खुशी मुझे किसी और चीज से नहीं मिलती है.”
उनकी किताब ‘कांगो: द एपिक हिस्ट्री ऑफ अ पीपल' 2010 में प्रकाशित हुई थी. इसके लिए, उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं. यह किताब कांगो के इतिहास और बेल्जियम के उपनिवेशवाद के बारे में है. इस किताब में बेल्जियम के उपनिवेश के तौर पर कांगो के अतीत की पड़ताल की गई है. इसका कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. इसकी खासियत यह है कि इसमें स्थानीय लोगों के साथ हुई बातचीत को शामिल किया गया है, जिन्हें अपनी कहानियां बताने का मौका दिया गया है.
अपनी 2020 की किताब "रेवोलुसी: इंडोनेशिया एंड द बर्थ ऑफ मॉर्डन वर्ल्ड” के लिए, रेब्रुक उस दौर के बचे हुए लोगों की कहानियों को इकट्ठा करना चाहते थे. इस किताब में, डच उपनिवेशवाद से आजादी के लिए इंडोनेशिया में हुए संघर्ष को बताया गया है. रेब्रुक कहते हैं, "मैं 1920 और 1930 के दशक के ऐसे लोगों से मिला था जिन्होंने वह समय देखा था. अब मुझे एहसास हुआ है कि मैं उनमें से कई लोगों से बात करने वाला शायद आखिरी व्यक्ति था.”
अपने गृहनगर बेल्जियम में, रेब्रुक की पहचान सिर्फ एक सफल लेखक के तौर पर ही नहीं है, बल्कि उन्होंने 'जी1000' नामक एक मंच की भी स्थापना की है. यह मंच नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित करता है. अब यूरोप के कई देशों में भी ऐसे नागरिक समूह बन रहे हैं.
डाविड फान रेब्रुक को गोएथे मेडल के लिए चुनने वाली जूरी ने कहा, "उनकी किताबों में अलग-अलग विषयों को शामिल किया जाता है. इन किताबों की सबसे खास बात यह है कि ये उन लोगों की कहानियों को जगह देती हैं जो समाज में हाशिये पर हैं. उनकी लिखने की शैली बहुत सीधी और दिल को छूने वाली है. उनके लेखन ने मौजूदा दौर की राजनीतिक सोच और बहस को एक नई दिशा दी है.”