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मौत के शिविर से आजादी की 80वीं सालगिरह

२७ जनवरी २०२५

दुनिया आज आउशवित्स के कैदियों की आजादी की 80वीं सालगिरह मना रही है. पोलैंड में कुख्यात नाजी कैंप वाली जगह पर कुछ पीड़ित और उनके रिश्तेदारों के साथ ही दर्जनों नेता सालाना समारोह में पहुंचे हैं.

आउशवित्स से आजादी की 80वीं सालगिरह के मौके पर वहां पहुंचे पीड़ित
यहूदियों पर नाजी दौर में हुए अत्याचारों की सबसे बड़ी निशानी है आउशवित्सतस्वीर: Aleksandra Szmigiel/REUTERS

एक्सटर्मिनेशन कैंपों में आउशवित्स सबसे बड़ा था. यह नाजी जर्मनी के दौर में 60 लाख से ज्यादा यूरोपीय यहूदियों के नरसंहार का प्रतीक बन गया. 1940 से 1945 के बीच इनमें से 10 लाख लोगों की हत्या आउशवित्स कैंप में ही हुई थी. इनमें एक लाख से ज्यादा गैर यहूदी लोग भी थे.

समारोह में पीड़ित और दर्जनों नेता 

सोमवार को पोलैंड के राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा ने पीड़ितों के साथ यहां फूल चढ़ाए. पीड़ितों में कुछ लोगों ने नीली और सफेद पट्टियों वाले स्कार्फ भी पहन रखे थे जो इस मौत के शिविर की यूनिफॉर्म हुआ करती थी.

बिर्केनाउ में आउशवित्स 2 के गेट के बाहर मुख्य समारोह में दर्जनों नेता पहुंच रहे हैं. इनमें ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय और फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों भी शामिल हैं. जर्मन राष्ट्रपति फ्रांक वाल्टर श्टाइनमायर और चांसलर ओलाफ शॉल्त्स, दोनों इस मौके पर वहां पहुंचेंगे. यातना शिविर के पीड़ित 91 साल के पावेल ताउसिग भी उनके साथ होंगे. 

आशवित्स का एक्सटर्मिनेशन कैंप सबसे बड़ा था, यहां 10 लाख से ज्यादा यहूदियों की जान गईतस्वीर: Aleksandra Szmigiel/REUTERS

आउशवित्स म्यूजियम के प्रवक्ता पावेल साविकी ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा, "इस साल हमारा ध्यान पीड़ितों और उनके संदेश पर होगा. किसी भी राजनेता का कोई भाषण नहीं होगा."

आउशवित्स के जिंदा सबूत

सालगिरह से पहले एएफपी से बातचीत में दुनिया भर के पीड़ितों ने कहा कि जब उस घटना के जीवित साक्ष्य नहीं बचेंगे तब, क्या हुआ था, उसकी याद को बचाए रखना जरूरी है.

उन्होंने दुनिया भर में बढ़ती नफरत और गैर-यहूदीवाद को लेकर चेतावनी दी और कहा कि उन्हें इतिहास दोहराए जाने की आशंका है. आयोजकों का कहना है कि यह शायद आखिरी सालगिरह है, जब इतने बड़ी संख्या में पीड़ित मौजूद हैं. साविकी ने कहा, "हम सब जानते हैं कि 10 साल बाद 90वीं सालगिरह के लिए इतने बड़े समूह को जुटा पाना संभव नहीं होगा."

यातना शिविर के पीड़ितों को आज भी उस वक्त का जिक्र करने पर आंसू नहीं थमतेतस्वीर: Privat

मौत का शिविर

दक्षिणी पोलैंड में ओसवाइसिम के बैरकों का इस्तेमाल कर 1940 में इस कैंप को बनाया गया था. इसके बाद नाजियों ने इसका नाम जर्मन में आउशवित्स कर दिया. उस साल 14 जून को पहली बार 728 पोलिश कैदियों को यहां लाया गया था. 17 जनवरी, 1945 को सोवियत सेना जब आगे बढ़ी तो नाजी सुरक्षा बल एसएस ने 60 हजार कैदियों को यहां से निकाल कर पश्चिम की ओर पैदल ले जाना शुरू किया.  यह इतिहास में "डेथ मार्च" के नाम से कुख्यात है.

इसके बाद, जनवरी 21-26 के बीच नाजियों ने बिर्केनाउ गैस चैंबर और क्रेमेटोरिया को उड़ा दिया और सोवियत फौजों के आने से पहले वे यहां से पीछे हट गए. 27 जनवरी को जब सोवियत सैनिक यहां पहुंचे तो उन्हें सात हजार कैदी मिले. उनकी आजादी के इस दिन को संयुक्त राष्ट्र ने 'होलोकॉस्ट रिमेंबरेंस डे' के रूप में मनाना शुरू किया.

80 साल पहले रूसी सेना जब आउशवित्स पहुंची तो वहां 7 हजार कैदी मिलेतस्वीर: AFP

यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की का कहना है कि दुनिया को "दुष्टों के सामने" जरूर एकजुट होना चाहिए. जेलेंस्की ने कहा, "हमें नफरत से उबरना चाहिए जो हत्या और दुर्व्यवहार को जन्म देता है. हमें माफ करने की प्रवृत्ति को बचाना चाहिए. और यह हर किसी का मिशन है कि वह दुष्टों को जीतने से रोके." 2022 में यूक्रेन पर हमले से पहले रूसी प्रतिनिधिमंडल सालाना समारोह में शामिल होता था. इस साल रूसी प्रतिनिधिमंडल के यहां आने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.

नेतन्याहू नहीं आए

ऐसी अफवाहें चल रही थी कि इस्राएली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू समारोह में हिस्सा ले सकते हैं. इसके बाद काफी विवाद शुरू हो गया. अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत ने नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया है. उन पर गाजा में मानवता के विरुद्ध अपराध के संदेह में यह वारंट जारी हुआ है.

पोलैंड की सरकार ने पिछले महीने ही इस बात की पुष्टि कर दी थी कि अगर नेतन्याहू समारोह में हिस्सा लेने आते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा. हालांकि नेतन्याहू ने अपनी तरफ से ऐसी कोई इच्छा नहीं जताई थी. इस्राएल के शिक्षा मंत्री योआव किश इस समारोह में शामिल हो रहे हैं. 

पीड़ितों के आंसू नहीं रुकते

एएफपी ने नाजी शिविरों के पीड़ितों में से करीब 40 से बातचीत की है. ये लोग 15 देशों में रहते हैं जिनमें इस्राएल से लेकर पोलैंड, रूस, अर्जेटीना, कनाडा और दक्षिणी अमेरिका के कुछ देश शामिल हैं. इन लोगों ने कैमरे पर आकर अपनी बात कही. कुछ अकेले थे तो कुछ के आसपास उनके नाती- पोते, परनाती और परपोते भी मौजूद थे.

चिली में रहने वाली 95 साल की मार्ता नॉयवर्थ ने कहा, "दुनिया ने आउशवित्स को मंजूरी कैसे दे दी? वह 15 साल की थीं जब उन्हें हंगरी से इस कैंप में भेजा गया था. वहीं, लगभग 100 साल की हो चुकीं यूलिया वालाच, उस दौर में जो हुआ, उसके बारे में बताते हुए अपने आंसू नहीं रोक पातीं.

उन्होंने कहा, "उस बारे में बात करना बेहद मुश्किल है, यह बेहद कठिन है." हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वह इसकी गवाही देती रहेंगी. उनके साथ उनकी परपोती फ्रैंकी ने पूछा, "जब ये नहीं रहेंगी और हम इस बारे में बात करेंगे तो क्या वे हमारा भरोसा करेंगे?"

एनआर/एके (एएफपी)

यातना की यादें

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