एक ओर ईरान युद्ध खत्म कराने के लिए सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्री पाकिस्तान में बातचीत कर रहे हैं. वहीं इस बीच अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपने सैनिकों की पहली टुकड़ी भेज दी है.
अमेरिकी सेना की ओर से जानकारी दी गई है कि समुद्र और जमीन दोनों पर कार्रवाई करने वाला यूएसएस ट्रिपोली युद्धक जहाज 3,500 अमेरिकी सैनिकों को लेकर मध्य-पूर्व पहुंच चुका है तस्वीर: US Navy/ZUMA/IMAGO
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ईरान युद्ध के और बड़े इलाके में फैलने के डर के बीच अमेरिकी सैनिक मध्य-पूर्व में पहुंच चुके हैं. यमन में मौजूद ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों ने शनिवार को पहली बार इस्राएल पर हमला किया था, इससे खाड़ी के इलाके में हालात और तनावपूर्ण हो गए थे. इसी बीच अमेरिका ने युद्धग्रस्त क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए हजारों सैनिक भेजे हैं. अमेरिकी सेना ने बताया कि दो निर्धारित कंटिंजेंट्स में से पहला दस्ता शुक्रवार को एक सैन्य जहाज में सवार होकर मध्य-पूर्व पहुंच गया है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका अपने लक्ष्य बिना जमीनी सेना उतारे भी हासिल कर सकता है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के पास रणनीति बदलने की अधिकतम गुंजाइश रहे, इसलिए कुछ दस्ते तैनात किए जा रहे हैं.तस्वीर: Edgar Su/REUTERS
वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि पेंटागन ईरान में कई सप्ताह चलने वाली जमीनी कार्रवाई की योजना बना रहा है. इसमें स्पेशल ऑपरेशंस फोर्सेस और पारंपरिक इन्फैंट्री के जरिए कार्रवाई की जा सकती है. हालांकि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इस तरह की तैनाती को मंजूरी देंगे या नहीं, यह अब भी साफ नहीं है. अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन ईरान में जमीनी सेना भेजने जैसे विकल्पों पर काफी समय से विचार कर रहा है.
सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्री पाकिस्तान में
अमेरिका और इस्राएल के 28 फरवरी को ईरान पर हमले के बाद यह युद्ध अब पूरे मध्यपूर्व में फैल चुका है. हजारों लोग मारे जा चुके हैं और तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होने से दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ा है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका अपने लक्ष्य बिना जमीनी सेना उतारे भी हासिल कर सकता है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के पास रणनीति बदलने की अधिकतम गुंजाइश रहे, इसलिए कुछ दस्ते तैनात किए जा रहे हैं. जल्द ही इस इलाके में अमेरिका की 82वीं एयरबोर्न डिविजन की बड़ी तादाद में तैनाती भी संभव है.
इस बीच पाकिस्तान क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए मध्यस्थ बनने की कोशिश में जुटा है. रविवार से इस्लामाबाद में सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत शुरू होगी. एक दिन पहले ही ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बात की थी.
खाड़ी देशों के दुबई जैसे शानदार शहर कभी लग्जरी और सुरक्षा की मिसाल हुआ करते थे. आज मध्य-पूर्व में युद्ध छिड़ने के बाद से वहां पर्यटन तो ठप हुआ ही है, इसकी साख भी दांव पर है.
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सब पड़ा है खाली
आम दिनों में दुबई के अल-सीफ बाजार में पर्यटकों का तांता लगा होता था लेकिन आज पूरा बाजार सुनसान है. अमेरिका-इस्राएल के ईरान पर हमला करने के बाद से बाजार का नजारा बिल्कुल उलट गया है.
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अमीरों की दुनिया
पिछले कई दशकों से दुबई के लिए एक बात कही जाती थी कि यह अमीरों की दुनिया है. दुनिया भर में कहीं किसी भी तरह का संघर्ष हो रहा हो, अमीरात की सीमाओं तक आते-आते सब थम जाता है. इस बार यह धारणा गलत साबित हुई. ईरान के जवाबी हमलों की चपेट में इस बार खाड़ी देश भी आ गए हैं, जिसने विदेशियों को यह क्षेत्र छोड़ के जाने के लिए मजबूर कर दिया है.
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हवाई अड्डे पर हमला
28 फरवरी को ईरान के साथ अमेरिका-इस्राएल युद्ध शुरू होने के बाद से कई खाड़ी देशों ने लगातार अपने इलाके में मिसाइल और ड्रोन हमलों की सूचना दी है. इस हमले में दुबई हवाई अड्डे के आस-पास कई ईंधन डिपो, अमेरिकी दूतावास और होटलों जैसे नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया.
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हवाई उड़ानें रद्द
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए दुबई हवाई अड्डा इस क्षेत्र के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक है लेकिन यात्री विमानों की उड़ानें लगातार रद्द हो रही हैं. ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के हमलों के बीच युद्ध की शुरुआत से ही इलाके के कई हवाई अड्डे आंशिक या सीमित क्षमता के साथ काम करने को मजबूर हैं.
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खाली पड़े समुद्री किनारे
दुबई के ब्रांड न्यू लग्जरी होटल जुमेराह मरसा अल अरब के समुद्री किनारे पर समुद्री पक्षियों के अलावा कोई नहीं है. विश्व यात्रा एवं पर्यटन परिषद के अनुसार पर्यटन में आई भारी गिरावट के कारण खाड़ी देशों को कम से कम 60 करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है. साल 2025 में पर्यटन संयुक्त अरब अमीरात की जीडीपी का लगभग 12 फीसदी था.
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साख है दांव पर
दुबई के प्रमुख पर्यटन बाजार अल-सीफ के इस दुकानदार के लिए भी यह एक बड़ा झटका है. होटल, रेस्तरां और दुकान सभी इससे प्रभावित हुए हैं. ईरान के साथ छिड़ा युद्ध न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदायी है बल्कि क्षेत्र की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है.
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कुछ सुरक्षित नहीं
अंतरराष्ट्रीय असमंजस के बीच पिछले कई सालों से खाड़ी देश खासकर दुबई खुद को निवेशकों और व्यवसायों के सामने एक सुरक्षित विकल्प के तौर पर पेश कर रहा था. केवल 2025 में ही लगभग 9,800 करोड़पति संयुक्त अरब अमीरात में आकर बसे, जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे अधिक है.
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बंजर पड़े शहर
दुबई की गिनती दुनिया के सबसे अमीरों शहरों में की जाती है. टैक्स में भारी छूट, व्यवस्थित नौकरशाही और ‘गोल्डन वीजा प्रोग्राम’ ने इसे अमीरों और व्यवसायों के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया था. कभी चहल-पहल से भरी रहने वाली जुमैरा बीच रेजिडेंस की सड़कें आज वीरान हैं.
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आर्थिक मॉडल संकट में
उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध कितना लंबा चलता है, इस बार निर्भर करेगा कि देश की प्रतिष्ठा को कितना नुकसान पहुंचा है और निवेशक कितनी गति से पैसा खीचेंगे. राइस यूनिवर्सिटी के बेकर इंस्टिट्यूट के जिम क्रेन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, “दुबई का आर्थिक मॉडल कितना संकट में है, इसे कम आंकना मुश्किल है. युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैकल्पिक स्थानों की खोज उतनी ही तेज होगी.”
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‘पर्यटकों की याददाश्त कमजोर’
कुछ लोगों का मानना है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. जर्मन सोसाइटी फॉर टूरिज्म स्टडीज के प्रेसिडेंट युरगन श्मुडे ने जेडडीएफ को बताया, “पर्यटकों की याददाश्त कमजोर होती है.” उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई संघर्ष या युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलता है तो पर्यटन स्थल को अधिक नुकसान नहीं पहुंचता है.
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ईरान और लेबनान पर हमले जारी
इस्राएल ने रविवार को दावा किया कि उसने ईरान की हथियार निर्माण इकाई को निशाना बनाया है. ईरानी मीडिया के मुताबिक ईरान के दक्षिणी बंदरगाह शहर बंदर-ए-खमीर में एक तट पर हुए हमले में पांच लोग मारे गए और दो जहाज नष्ट हो गए.
लेबनान में भी इस्राएल ने हमले तेज कर दिए हैं. कथित तौर पर हिज्बुल्लाह से जुड़े पत्रकारों पर एक स्ट्राइक में तीन लेबनानी पत्रकारों की मौत हुई है, साथ ही एक लेबनानी सैनिक भी मारा गया है. बचाव दल पर हुए दूसरे हमले में और लोगों के हताहत होने की खबर है. इस्राएली सेना का दावा है कि मारा गया पत्रकार हिज्बुल्लाह की इंटेलिजेंस यूनिट का हिस्सा था.
ईरान ने भी इस्राएल और खाड़ी देशों पर अपने ड्रोन हमले जारी रखे हैं. इराक के कुर्द नेता मसूद बरजानी के घर के पास एक ड्रोन मार गिराया गया. इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति के घर पर भी इसी तरह का हमला हुआ.
सरकार विरोधी प्रदर्शनों की लहर भारत समेत ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में चली हुई है. इनमें से कइयों का मोर्चा देश की महिलाओं ने संभाला है, जो बड़े जोखिम उठा कर व्यवस्था को चुनौती दे रही हैं.
तस्वीर: DW/H.Sirat
भेदभावपूर्ण कानून के खिलाफ
भारत के आम नागरिकों के समूहों ने देश में लागू हुए नए नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ कई हफ्तों से प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारी सत्ताधारी बीजेपी पर मुसलमानों के प्रति इस तथाकथित भेदभावपूर्ण कानून को वापस लेने का दबाव बना रहे थे.
तस्वीर: DW/M. Javed
फासीवाद के खिलाफ संघर्ष
भारत के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाली छात्राओं ने देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को ठेस पहुंचाने की कोशिशों का विरोध किया. विवादास्पद कानून के अलावा युवा स्टूडेंट ने फासीवादी सोच, स्त्री जाति से द्वेष, धार्मिक कट्टरवाद और पुलिस की बर्बरता के खिलाफ भी आवाज उठाई.
तस्वीर: DW/M. Krishnan
दमनकारी सत्ता के खिलाफ
ईरानी महिलाओं ने 1979 की इस्लामी क्रांति के समय से ही सख्त पितृसत्तावादी दबाव झेले हैं. बराबरी के अधिकारों और बोलने की आजादी जैसी मांगों पर सत्ताधारियों ने हमेशा ही महिलाओं को डरा धमका कर पीछे रखा है.फिर भी महिलाएं हिम्मत के साथ तमाम राजनैतिक एवं नागरिक प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही हैं.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/J. Roberson
पाकिस्तानी महिलाएं बोल उठीं बस बहुत हुआ
भारत के पड़ोसी पाकिस्तान में भी बराबर का हक मांगने वाली महिलाओं के प्रति बुरा रवैया रहता है. इन्हें कभी "पश्चिम की एजेंट" तो कभी "एनजीओ माफिया" जैसे विशेषणों के साथ जोड़ा जाता है. महिला अधिकारों की बात करने वाली फेमिनिस्ट महिलाओं को अकसर समाज से अवहेलना झेलनी पड़ती है. फिर भी रैली, प्रदर्शन कर समाज में बदलाव लाने की महिलाओं की कोशिशें जारी हैं.
तस्वीर: Reuters/M. Raza
लोकतंत्र को लेकर बड़े सामाजिक आंदोलन
पाकिस्तान में हुए अब तक के ज्यादातर महिला अधिकार आंदोलन कुछ ही मुद्दों पर केंद्रित रहे हैं, जैसे लैंगिक हिंसा, बाल विवाह और इज्जत के नाम पर हत्या. लेकिन अब महिलाएं लोकतंत्र-समर्थक प्रदर्शनों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने लगी हैं. पिछले साल पाकिस्तान की यूनिवर्सिटी छात्राओं ने राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन का नेतृत्व किया जिसकी मांग छात्र संघों की बहाली थी. दबाव का असर दिखा और संसद में इस पर बहस कराई गई.
तस्वीर: DW/T. Shahzad
इंसाफ के लिए लड़तीं अफगानी महिलाएं
अमेरिका और तालिबान का समझौता हो गया तो अफगानिस्तान में एक ओर युद्धकाल का औपचारिक रूप से खात्मा हो जाएगा. लेकिन साथ ही बीते 20 सालों में अफगानी महिलाओं को जो कुछ भी अधिकार और आजादी हासिल हुई है वो खतरे में पड़ सकती है. 2015 में कुरान की प्रति जलाने के आरोप में भीड़ द्वारा पीट पीट कर मार डाली गई फरखुंदा मलिकजादा के लिए इंसाफ की मांग लेकर भी महिला अधिकार कार्यकर्ता सड़क पर उतरीं. (शामिल शम्स/आरपी)
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रूस ने ईरान से निकाले अपने कर्मचारी
हूथी विद्रोहियों के दोबारा इस्राएल पर हमले के बाद वैश्विक शिपिंग उद्योग के लिए नया खतरा पैदा हो गया है. होर्मुज जलडमरूमध्य पहले ही लगभग बंद है और दुनिया की ऊर्जा सप्लाई इसका खामियाजा भुगत रही है. अब बाब-अल-मंदेब पर भी खतरा बढ़ सकता है, जहां से होकर बड़ी संख्या में जहाज स्वेज नहर की ओर जाते हैं.
ईरान युद्ध के चलते अमेरिका में भी युद्ध विरोधी प्रदर्शनों ने भी रफ्तार पकड़ ली है. डॉनल्ड ट्रंप लगातार संकेत दे रहे हैं कि वे युद्ध जल्द खत्म करना चाहते हैं, हालांकि ईरान के बिजलीघरों और ऊर्जा ढांचे पर हमलों की चेतावनी भी उन्होंने अभी वापस नहीं ली है. फिर भी होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने के लिए दी गई समयसीमा उन्होंने 10 दिन और बढ़ा दी है. हालांकि ईरान कुछ जहाजों को होर्मुज से गुजरने दे रहा है. पाकिस्तान ने बताया है कि ईरान ने 20 पाकिस्तानी जहाजों को जलडमरूमध्य से गुजरने की मंजूरी दे दी है.
इस बीच रूस की परमाणु एजेंसी रोसएटॉम ने बसरा के बुशहर प्लांट से अपने कर्मचारियों को निकाल लिया है और चेतावनी दी है कि हमलों से परमाणु सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने भी कहा है कि यदि ईरान के आर्थिक ढांचे या इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला हुआ तो इसका कड़ा जवाब दिया जाएगा.